
कवि वही जो अकथनीय कहे!
हिन्दी रचना जगत में बहुत कम ही ऐसे लोग है, जिन्होंने कविता या अन्य किसी विधा में लेखन के अलावा चित्रकला और पुरातत्व में भी काम किया हो। आश्चर्य यह भी कि पुरातत्व में काम करने वाले रचनाकार और भी मुश्किल से मिलते हैं। किंतु जगदीश गुप्त जी ने इन तीनों विधाओं में साधिकार और उल्लेखनीय कार्य किया। वह मनुष्य की इच्छाशक्ति की अदम्यता पर विश्वास करते थे। प्रस्तुत है कवि, चित्रकार जगदीश गुप्त से धनंजय सिंह का संभवतः अंतिम साक्षात्कार
अप्रतिम चित्रकार एवं कविता के कीर्ति पुरुष, भारत भारती सम्मान प्राप्त डा0 जगदीश गुप्त हिन्दी रचना जगत के उन वरिष्ठ लेखकों में से रहे हैं जो हमेशा नीची निगाह किए चलते रहे हैं। इलाहाबाद जैसे शहर में, जहां लेखक लिखने से ज्यादा हल्ला मचाने में विश्वास करता हो, वहां जगदीश गुप्त का अपवाद बने रहना एक करतब ही कहा जाएगा। 1950 में डा0 गुप्त जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लेक्चरर के रूप में आए, उन दिनों हिंदी में दो आंदोलन चरम पर थे, एक प्रगतिवाद और दूसरा प्रयोगवाद। रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, लक्ष्मीकांत वर्मा एवं जगदीश गुप्त जैसे बहुत-से कवि तार सप्तक से बाहर होकर भी प्रयोगवाद का मुहावरा अपना चुके थे।
पचास के दशक के पूर्वार्द्ध में जगदीश गुप्त ने एक अनियतकालीन काव्य संकलन निकाला-नई कविता जो अपने समय का बेहद सुरुचि पूर्ण और प्रतिनिध संग्रह था। हिंदी रचना जगत में बहुत कम ही ऐसे लोग हैं, जिन्होंने कविता या अन्य किसी विधा में लेखन के अलावा चित्रकला और पुरातत्व में भी काम किया हो। आश्चर्य यह भी है कि पुरातत्व में करने वाले रचनाकार और भी मुश्किल से मिलते हैं। किन्तु जगदीश गुप्त जी ने इन तीनों विधाओं में साधिकार और उल्लेखनीय कार्य किया।
26 मई को प्रातः चार बजे सिविल लाइन्स, इलाहाबाद में स्थित हार्ट लाइन अस्पताल में पिछले लगभग पंद्रह दिनों से जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करते हुए उन्होंने अचानक दम तोड़ दिया।
डा0 गुप्त हृदय रोग के कारण काफी अस्वस्थ चल रहे थे, पिछले दस वर्षों से मेरा उनसे आत्मीय संबंध एवं सान्निध्य रहा है। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि जिन्हें मैं अपना आदर्श गुरु मानता आया हूँ, जिन्होंने समय-समय पर कविता, चित्र तथा लेखन जैसी विधाओं के लिए निरन्तर मुझे प्रेरित किया है, उनके विषय में मैं क्या-क्या लिखूँ, कितना लिखूं और क्या छोड़ दूं। इतने अधिक संस्मरण हैं उनके साथ जिन्हें मैं शब्दों में कह नहीं सकता। हां कभी लेख के माध्यम से अथवा पुस्तक के रूप् में अवश्य प्रस्तुत करूँगा, ऐसा संकल्प है।
ऐसे श्रेष्ठ पुरुष के विषय में मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि उनमें जो सबसे बड़ी विशेषता रही है, वह है मनुष्य की इच्छाशक्ति की अदम्यता पर विश्वास और आजीवन संघर्ष करते रहने की नियति। ये बातें उनकी कविताओं में भी उपस्थित मिलती है, जो इस प्रकार है
नहीं उस भांति मैं डूबा/चलाए हाथ/लहरों से लड़ा/
मानी नहीं मैंने पराजय अंत तक/ विश्वास अपने पर किया/
तो क्या हुआ डूबा अगर/क्या पार जाने से इसे कम कहेगा कोई?
इसके अलावा अक्सर हमें यह कविता की यह पंक्ति सुनाया करते थेः
टूटे नहीं इंसान, बस संदेश यौवन का यही,
सच हम नहीं सच तुम नहीं, सच है सतत संघर्ष ही।
अभी कुछ वर्ष से वह बहुत ज्यादा अस्वस्थ हो गए थे, तब भी उनमें सृजन करने की ललक और अदम्य जिजीविषा विद्यमान थी। हृदय रोग के कारण वह जब दिल्ली में पंत अस्पताल में भर्ती थे उन दिनों भी वह रेखाओं के माध्यम से अपने जीवनानुभव को अभिव्यक्ति देते रहे। छिहत्तर वर्षीय जगदीश गुप्त ‘बाईपास सर्जरी’ और उसके बाद इंफेक्शन के कारण और भी कमजोर होते गए, इसके बावजूद वह लगातार विभिन्न समारोंहों, व्याख्यानमालाओं एवं कला संबंधी कार्यक्रमों में बढ़ चढकर हिस्सा लेते रहे।
पिछले दिनों लंबे समय तक स्वस्थ रहने के बाद वह पुनः अस्वस्थ हो गए और धीरे-धीरे उनकी हालत बिगड़ती ही गई। इतनी अस्वस्थता के बावजूद वह किसी भी मुद्दे पर बातचीत करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। अभी जब 20 अप्रैल को वह प्रीती हास्पिटल में भर्ती थे तब मैं उनसे मिलने गया और देखा कि अभी भी उनकी आंखों में सर्जना की वही दीप्ति दिखाई दे रही थी।
उनकी इस छवि को देखकर मेरे भीतर अनेंकों प्रश्न उभरने लगे और मैंने उसी बीच उनसे उनकी साहित्यिक गतिविधियों एवं चित्रयात्रा, जीवनयात्रा के संदर्भ में बातचीत करने का आग्रह किया, और वह सहज ही इसके लिए तैयार हो गए। उन्होंने मेरे जिज्ञासा भरे सवालों के उत्तर बहुत ही गंभीरता एवं पूरी तन्मयता के साथ दिए। उनसे किए इसी समालाप का विस्तृत विवरण प्रस्तुत हैः
प्रश्न: जीवन के लंबे साहित्यिक अनुभवों के बीच आज आपकी दृष्टि में साहित्य का क्या स्तर है?
उत्तर : आज महसूस कर रहा हूं कि लोग साहित्य से दूर होते जा रहे हैं। सबसे अजीब बात तो यह है कि लोग साहित्यकारों को भी भूल गए हैं, आज कई युवा मेरे पास आते हैं और मुझसे निराला, महादेवी, मुक्तिबोध, अज्ञेय के बारे में पूछते हैं। यह हमारे समाज की विडंबना हो गई है कि हम अज्ञेय, मुक्तिबोध, निराला को भी नहीं जानते हैं।
प्रश्न : पूरे छिहत्तर वर्ष पूर्ण कर लेने के बाद आज आपका काम करने का ढंग तथा आपकी दिनचर्या क्या है?
उत्तर : आदमी कर्मशीलता से पहचाना जाता है। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचना’—श्रीमद्भागवत गीता का यह वाक्य मुझे हमेशा प्रेरणा देता रहा है। जहां तक दिनचर्या का प्रश्न है, चूंकि अवकाश प्राप्त होने के बाद दिनचर्या स्वतः निर्धारित है अतः उसमें अंतर आता ही नहीं। अगर कहीं आना-जाना और कुछ लोगों का आना हुआ तो कुछ अंतर अवश्य ही पड़ता है, सवेरे-सवेरे ब्रह्य वेला में उठना मेरे स्वभाव का अंग रहा है। कभी चार से पहले, कभी चार के बाद उठकर कुछ कविता जैसी पंक्तियां लिख लेता हूँ, सवेरे अखबार आ जाते हैं, तो मैं उन्हें शत्रु मानता हूं (हंसते हुए) शत्रु आ गया तो उसके बाद कुछ भी काम नहीं होता। मैं देखता हूं कि बहुत चीजें ऐसी हैं, जिसको न पढ़े तो लगता है कि जीवन से हम संपृक्त नहीं हुए। रात्रि में, दस-ग्यारह बजे तक सो जाना, पांच साढ़े पांच घंटे की नींद लेना और बिन जगाए ही उठ जाना मुझे सहज ही लगता है।
प्रश्न : आप लंबे समय तक महाकवि निराला जी से जुड़े रहे, यदि उनसे संबंधित कोई संस्मरण याद हो तो बताएं।
उत्तर : हां, एक संदर्भ मैं आपको बताता हूं। उन दिनों मैं दारागंज मोतीमहल में रहता था, जहां निराला जी भी रहते थे। लगभग तीस साल तक मैं निराला जी के सान्निध्य में रहा। वैसे निराला जी कभी अपने घर में नहीं रहे। जीवनपर्यत वह कमलाशंकर सिंह के यहां अतिथि के रूप् में रहे। एक बार एक समारोह के दौरान मेरी मुलाकात उनसे हुई। उन्होंने मेरा हाल-चाल पूछा। मैं उन दिनों बहु परेशान चल रहा था। मैंने परेशानी का कारण उन्हें बताया, मेरी बेटी बीमार चल रही है, उसे माता निकल आई है। फिर वह अन्य लोगों से बातचीत करने में गुम हो गये। अगले दिन मैंने देखा, वह स्वयं मेरे घर मेरी बेटी को देखने पहुंचे। यह घटना मुझे आज तक याद है।
प्रश्न : इसी समय ‘परिमल’ के साथ ही ’साहित्यकार संसद’ का भी शुभारंभ हुआ था। दोनों अपना दायित्व निभाने में कहां तक सफल सिद्ध हुए?
उत्तर : सन् 1944 से आरंभ होकर पच्चीस सालों तक ’परिमल’ ने अपना ऐतिहासिक दायित्व पूर्ण किया। यह संस्था समय-समय पर साहित्यिक संगोष्ठियां आयोजित करवाती थी, जिसमें साहित्य के विविध रूपों पर चर्चा भी होती थी। आज तो वैसी गोष्ठियां कहीं सुनने को भी नहीं मिलती। इसी सन् में ही ‘साहित्यकार संसद’ का भी शुभारंभ हुआ। उन दिनों निराला जी ‘साहित्यकार संसद’ में रहने लगे थे। कुछ दिनों तक पंत जी भी साहित्यकार संसद में रहे। इसकी शुरूआत में ही दिनकर जी ने अपनी प्रसिद्ध कविता की एक पंक्ति को तेजस्वी स्वर में सुनायाः
तान-तान फन व्याल कि तुझ पर मैं बांसुरी बजाऊं
यह कविता संसद के प्रांगण में ही नहीं, बल्कि हम लोगों के मन में भी गूंजती रही।
प्रश्न : ‘साहित्यकार संसद’ के संस्थापक कौन थे ? यदि उनके नामों का उल्लेख करेंगे तो बेहतर होगा।
‘साहित्यकार संसद’ के संस्थापक लोगों में सभी उल्लेखनीय है। रायकृष्ण दास, मैथिलीशरण गुप्त, उनके अनुज सियाराम शरण गुप्त, माखन लाल चतुर्वेदी तथा स्वयं महादेवी वर्मा जी थीं।
प्रश्न : आपने एक समय काफी आवरण चित्र (कवर डिजाइन) बनाए। आज उन दिनों को याद करके आप कैसा अनुभव करते हैं?
उत्तर : मेरा उपेंद्रनाथ ‘अश्क’ जी से बहुत ही घनिष्ठ संबंध रहा है। उनकी पुस्तकों पर बहुत से आवरण चित्र मैंने ही बनाए हैं। उन दिनों पाठक भी मेरी कला से इतने प्रभावित थे कि जो पुस्तकें खरीदते थे, उस पर मेरी कला वाली पुस्तक को प्राथमिकता देते थे। प्रसाद जी, महादेवी जी, नंद दुलारे वाजपेयी जी तथा अन्य लोगों के जो प्रकाशन भारती भंडार से होते थे उनका कला रूप मुझे ही निर्धारित करना होता था। आज मुझे ऐसा अनुभव होता है कि लोग कला की महत्ता को भूलते जा रहे हैं। मैने अपने जीवन की अधिकांश बातें अपनी कविता और रेखाचित्रों के माध्यम से कही है।
प्रश्न : आपने चित्र के साथ कविता और कविता के साथ चित्र बनाए है। क्या यह बताएंगे कि इन दोनों के बीच आप किस प्रकार सामंजस्य रख सके?
उत्तर : स्वयं क्या है अपने भीतर, कौन-सी चित्र प्रवृत्ति जागृत होती है और कौन-सा संकल्प प्रकट होता है - इसका कोई विधान नहीं है। रचना इसीलिए प्रेरणा से संबद्ध मानी जाती है, कविता के भीतर चित्रात्मकता रहती है। मैंने लिखा भी –‘शब्दों में सोया हुआ काव्य’। इसी तरह चित्रों में कविता पहचानी जाती है, एक युग था जब चित्र कविता के साथ प्रकाशित होते थे, या चित्रों पर कविता पंक्तियां भाव को उजागर करने के लिए दे दी जाती थीं। माधुरी, चांद, विशाल भारत के युग में ऐसा बहुधा होता था। बाद के क्रम में पत्र-पत्रिकाओं का रूप् बदल गया और उनकी प्रवृत्तियां भिन्न हो गई—कविता, कविता के रूप में और चित्र, चित्र के रूप् में । जहां तक मेरा प्रश्न है, मैंने कई जगह अपनी बात कही है और कई कविताओं में उसे निरूपित भी किया है।
प्रश्न : आपने जब साहित्य जगत में प्रवेश किया था, तब के साहित्यिक वातावरण में और आज के साहित्यिक वातावरण में सबसे बड़ा अंतर क्या लगता है?
उत्तर : अंतर तो निश्चित रूप् से हैं, पर सबसे बड़ा अंतर क्या है—यह कहना कठिन है। आज अधैर्य सबसे ऊपर है। कोई भी आदमी इसके लिए तैयार नहीं है, कि अधिक अध्ययन करना पड़े और अधिक श्रम करना पड़े जिससे और अधिक कर्मशीलता जागृत रहे। ‘शार्ट कट’ की संस्कृति अपना ली है लोगों ने।
प्रश्न : आप ‘परिमल’ की शुरुआत से रजत जयंती पर्व तक लगभग छह वर्षों तक संयोजन रहे हैं। इस संस्था ने आपके जीवन को किस रूप में प्रभावित किया?
उत्तर : जब निराला जी जीवित थे, उस समय कुछ साहित्यकारों ने मिलकर ‘परिमल’ संस्था बनाई। मैं भी उस संस्था जुड़ा रहा। ‘परिमल’ संस्था हम लोगों के साथ जीवन शक्ति के रूप् में आई। ‘परिमल’ शब्द परिमल नामक रचना से प्रेरित है, साथ ही आजीवन हम लोगों को निाराला जी का स्नेह वरदान मिलता रहा।
प्रश्न : लेखन विधा की प्रेरणा कब और किससे प्रभावित होकर मिली?
उत्तर : मेरी माता जी के जीवन काल में जो पुस्तकें उनके साथ रहती थीं उनमें एक दिनचर्या नामक पुस्तक थी। मैं नहीं जानता था कि कोई व्यक्ति साहित्यकारों और कलाकारों की दिनचर्या को एकत्र करने का संकल्प करेगा। तभी से मैंने लिखना कर लिया, तो लिख रहा हूं।
प्रश्न : आपने मां के लिए नाम से एक लंबी कविता लिखी हैं, जिसका तमिल अनुवाद हिंदुस्तानी एकेडमी से मूल सहित प्रकाशित हो चुका है, कृप्या अपनी मां के बारे में हमें कुछ बताए?
उत्तर : मेरी बहुत-सी बातें मेरी माता जी ही बता सकती हैं, जिनके न रहने पर मां के लिए नाम से एक लंबी कविता लिखी। उसे लिखते समय मेरे भीतर आत्मनिरीक्षण की प्रवृत्ति जागी। उसी ने मुझे फिर सक्रिय बनाया है, साथ ही मां के लिए मेरा विशाल चित्र इस पुस्तक मेंलघु रूप् में प्रकाशित हुआ है और अंत में मां का रेखांकन भी है, जो मैने उनके जीवन काल में बनाया था। माता जी दिवंगत हो जाने पर लगभग एक महीने मैं अपनी पीड़ा को, अभाव को स्मृतियों को साकार करते हुए उन्हें शब्दबद्ध करने के क्रम में और भी अधिक संलग्न रहा। संलग्न रहने में बहुत दूर तक उनका अभाव भाव में परिणत हो गया। जो लोग उस कविता को पढ़तेहैं , वे लोग भी ऐसा अनुभव करते हैं।
प्रश्न : आज धर्मवीर भारती, अमृतराय, हरिवंश राय बच्चन जैसे अनेक साहित्यकार इलाहाबाद छोड़कर बंबई चले गए, लेकिन अपने इलाहाबाद को ही अपना निवास स्थान चुना। क्यों?
उत्तर : हां, यह सत्य है कि बहुत-से साहित्यकार प्रयाग भूमि को छोड़कर अन्य शहरों में बस गए, मैंने भी कई जगह जाकर देखा है कि आत्मीयता का वातावरण जो रचना को संभव बनता है वह इलाहाबाद में विशेष है। इसीलिए मुझे लगता है कि इलाहाबाद ने ही मेरे भीतर एक रचनाकार की आग को दहकाए रखा। इलाहाबाद में मेरी सबसे पुरानी पहचान गोपेश जी से थी। उन्हीं के साथ पं0 अमरनाथ झा और फिराक साहब के व्यक्तितव के निकट आने का अवसर मिला।
प्रश्न : आपने एक लंबी काव्य यात्रा संपन्न की है, उन पड़ावों की ओर जब आप दृष्टिपात करते हैं तो क्या किसी सार्थकता अथवा कृतार्थता का बोध होता है?
उत्तर : मेरे कलागुरु आचार्य क्षितींद्र नाथ मजूमदार थे जिनसे मैंने ‘वॉश’ टेक्निक सीखी और अनेक चित्र इस शैली में बनाए। ‘दीप शृंखला के मेरे चित्र इसी से प्रेरित हैं। इससे पहले भी बहुत से चित्र जैसे ‘रतिकाम’ आदि। मेरे पिता जी का देहावसान देहरादून में उस समय हुआ जब मैं दस साल का भी नहीं था। इसके बाद माता जी को शोक वर्ष के रूप् में शाहाबाद में रहना पड़ा। वह मुझे शिक्षा देने के लिए सीतापुर, मुरादाबाद, कानपुर और अंततः इलाहाबाद आकर रहीं। मां के लिए जो कविता पुस्तक मैने लिखी है उसमें मां के न रहने पर मैने अपने भीतर उनकी छवि को मूर्त करते हुए और आत्म परितोष के लिए काव्य का रूप् प्रदान किया गया अनेक साहित्यकारों ने इस रचना के लिए मुझे सराहा है। मैं इसका श्रेय स्वयं माता जी को देता हूं। मेरी माता जी का चरण स्वर्श एवं आशीर्वाद ग्रहण करने आचार्य विष्णुकांत शास्त्री, धर्मवीर भारती, रामकुमार वर्मा आदि आते थे। ये लोग हमेशा उन्हें अपनी माता के रूप में देखा करते थे।
प्रश्न : आप एक साहित्यालोचक भी रहे हैं। नई कविता के कवि तथा त्रयी में आपने अज्ञेय की आलोचना करते हुए अन्य कवियों का पक्ष प्रस्तुत किया। आज आपकी नजर में इस सदी के सबसे बड़े आलोचक है?
उत्तर : यह सभी जानते हैं कि रामविलास शर्मा आज भी सर्वोच्च पद रखते हैं, यद्यपि नामवर सिंह उनको छोटा करने की चेष्टा में लगे रहते हैं। जहां तक नई कविता का संदर्भ है, दोनों आलोचक नई कविता को अज्ञेय से जोड़कर सही मूल्यांकन नहीं कर पाते, अज्ञेय से संबद्ध होने के कारण। नामवर जी मुक्तिबोध को सर्वश्रेष्ठ कवि बताते हैं जबकि अज्ञेय जी ने ही तार सप्तक में मुक्तिबोध को पहली बार प्रस्तुत किया। मैं मानता हूँ कि कविता स्वयं किसी आलोचक की मोहताज नहीं होती, आलोचक अवश्य कविता का मुखापेक्षी होता है।
प्रश्न :ब्रज भाषा और नई कविता शैली-दोनों ही में आपने रचनाएं की है। दोनों की काव्य-भाषा के बीच आप किस प्रकार सामंजस्य रख सके?
उत्तर : एक जमाने में ब्रज भाषा का इतना वर्चस्व था कि हिंदी कविता भी भरतेन्दु की दृष्टि में ब्रज भाषा कविता थी। लोग मानते थे—
जो न जाने ब्रज भाखा, ताहि साखा मृग जानिए।
मैंने छंद शती की विस्मृत भूमिका में नवीनता की पहचान को भाषा से ऊपर प्रतिष्ठित किया है। हिन्दी साहित्य में यह विचित्रता है कि एक सौ-सवा सौ वर्ष के भीतर ब्रज भाषा में ऐसा रूपांतर हुआ कि खड़ी बोली सर्वोच्च प्रतिष्ठिा पा गई। अयोध्या प्रसाद खत्री जैसे लोग भले ही अब याद न किए जाएं पर उनका योगदान चिर-स्मरणीयं है। मैं खड़ी बोली और ब्रज भाषा में द्वंद्व नहीं मानता हूं- ’मोरे भरत राम द्विअ आंखी।’ यही भाव मैं खड़ी बोली और ब्रज भाषा के प्रति रखता हूँ और अंततः निद्र्वद्व रहता हूं।
प्रश्न : आपने इतना कुछ लिखा है और इस अवस्था में भी इतना अधिक रमकर लिख रहे हैं। आज जब आप अपनी रचनाओं को पुनः देखते हैं तो कैसा अनुभव करते हैं।
उत्तर : हम अपनी रचनाओं को जब दुबारा पढ़ते हैं तो लगता ही नहीं कि हमने ही लिखी है और जब लगता है तब लगता है कि उसको जोड़ने वाले सूत्र भी होने चाहिए जिससे हम यह जान सकें कि यह रचनाएं हमने क्यों लिखी। ‘क्यों’ का उत्तर रचनाकार नहीं देता, रचना अवश्य देती है। हम कभी-कभी एक बेचैनी का अनुभव करते हैं—‘सब जानत प्रभु प्रभुता सोई, तदापि कहे बिना रहा न कोई’ कहने की बेचैनी रचना का मूल धर्म है। इसके लिए एक शब्द है ‘विवक्षा’—कहने की उत्कंठा और मैं अपने आप कहता हूं ‘कवि वही जो अकथनीय कहे, किन्तु सारी विषमताओं के बीच मौन रहे।’
प्रश्न :क्या ऐसा कुछ है जो आप समझते हैं कि छूट गया है और जिसे आप पर हर हाल में पूरा कर लेना चाहते है?
उत्तर: हां, बहुत-से संकल्प हैं जो मूर्त नहीं हुए, बहुत सी रचनाएं प्रकाशित नहीं हुई, बहुत से रेखाकन संयोजित होकर प्रदर्शित नहीं हुए ‘जैसे’ माघ मेले के संदर्भ में ‘यात्रा के संदर्भ में, पर्वतीय क्षेत्र के संदर्भ में’ और कल्पना से रचित आकर। गोवा में ‘मट्टन चेरी पैलेस’ के शिल्प मेरे मन में अभी तक छाए हुए हैं जिन्हें मौका मिलने पर पूर्ण करने की ललक बराबर विद्यमान है।
प्रश्न: कवि, चित्रकार एवं साहित्यकार के अलावा आप एक पुरातत्ववेत्ता भी हैं, इसकी प्रेरणा आपको कहां से और कैसे प्राप्त हुई?
उत्तर : जननी जन्म भूमिश्च सवर्गादपि गरीयस-वाल्मीकी रामायण का यह कथन मुझे निरंतर प्रेरणा देता रहा है। मेरी जन्मभूमि इलाहाबाद (हरदोई, उ0प्र0) ने मुझे मृणमूर्तियों का अभूतपूर्व संग्रह करने की प्रेरणा दी और आज वही मेरे तलघर में सुरक्षित है। मेरी कविता, चित्र तथा साहित्य के संदर्भ में अब तक अनेकों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है किंतु परातत्व पर एक भी पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई। जबकि ऐसा होने से ज्ञान के क्षेत्र में व्याप्त बहुत-सा अभाव दूर हो सकता था। पटना, राजघाट, मथुरा, कन्नौज आदि क्षेत्रों से जो मृणमूर्तियां संग्रहालय में प्रदर्शित है, उनमें से बहुत सी ऐसी है जिनकी पहचान मेरे संग्रह से विधिवत हो सकती है और कुछ ऐसी अद्भुत मृणमूर्तियां हैं जो कदाचित किसी अन्य संग्रह में नहीं हैं जैसे ‘मत्सयवाहिनी गंगा।’
प्रश्न : एक साहित्यकार के लिए पुरस्कार का क्या महत्व है?
उत्तर : पुरस्कार या सम्मान को मैं प्रतिफल मानता हूँ, फल नहीं। ‘काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये’ इसका आशय यह है कि काव्य यश, अर्थ और कल्याण (शिवत्व) से जुड़कर अशिव की क्षति करता है। शिव कल्याणकारी रूप् में कविता से निरंतर जुड़ा रहा है, संस्कृति और समाज दोनों व्यक्ति-केन्द्रित जीवन दृष्टि से सार्थकता ग्रहण करते हैं। कला और कविता सामूहिक रचना होती। शिल्प अवश्य कभी-कभी सामूहिक रचना से रचा जाता है।
प्रश्न : आज के उदीयमान रचनाकारों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर : मुझसे आगे आने वालों से एक संदेश मेरा, तुमसे एक संदेश मेरा- इसके लिए मैं अपनी कविता ’कवि’ गीत की कुछ पंक्ति प्रस्तुत करना चाहूंगाः
शांति मन में, क्रांति का संकल्प लेकर टिकी हो.....
क्हीं भी गिरवी न हो ईमान जिसका,
कहीं भी प्रज्ञा न जिसकी बिकी हो।
जो निरंतर नई रचनाधर्मिता से रहे पूरित
लेखनी जिसकी, कलुष में डूबकर भी,
विशद उज्जवल कीर्तिलाभ लहे!
कवि वही जो अकथनीय कहे!
किंतु सारी मुखरता के बीच मौन रहे!
कवि वही जो अकथनीय कहे .......।
v
चित्रकला सब कलाओं की आंख है !
जगदीश जी के लिए कविता अभिव्यक्ति का एक माध्यम रही तो चित्रकला दूसरा। उनके काव्य सृजन में चित्रों की अकथनीयता शब्दों का रूप ले लेती रही तो चित्र रचना में कविता का सत्व समाहित हो जाता रहा। यद्यपि बहुत-सी चीजें शब्दातीत होकर उन्हें झंकृत करती रहीं, पर कई बार भावाभिव्यक्ति के लिए शब्द उन्हें छोटे मालूम पड़ते रहे और रेखाएं, रंग और आकृतियां बड़ी। बस शायद इसीलिए गुप्त जी की लेखनी और तूलिका से सृजित सर्जनात्मक सृष्टि में कविता और चित्रकला समानांतर होते हुए भी कदाचित् चित्रात्मक बड़ी हो जाती थी और चित्रकार जगदीश गुप्त, कवि जगदीश गुप्त से गुरुतर। पिछले दिनों लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। प्रस्तुत है, कवि, चित्रकार जगदीश गुप्त के बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचय अनिल सिद्धार्थ द्वारा…..
कला मेरे लिए बहुलोचना नदी है और कविता अभिव्यक्ति की चुनौती। कला पहले व्यक्ति से व्यक्ति को जोड़ती है और फिर व्यक्ति को समाज से। इसीलिए व्यक्ति और समाज, शब्द और अर्थ मेरी दृष्टि में अर्द्धनारीश्वर की तरह अन्योन्याश्रित है।’
कला और कविता के अंतर्सबंधों को रेखांकित करते इन विचारों के प्रबल पक्षधर प्रख्यात कवि व चित्रकार जगदीश गुप्त अब दैहिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे। अद्भुत जिजीविषा के धनी डा0 गुप्त बार-बार मौत को मुंह चिढ़ाते रहे। पर गत 26 मई की भोर में उन्होंने अंतिम सांस ली और हमेशा के लिए अपनी आंखे मूंद ली।
पहले मध्य प्रदेश के मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और फिर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के भारत भारती सम्मान से सम्मानित डा0 गुप्त के लिए कविता अभिव्यक्ति का एक माध्यम रही तो चित्रकला दूसरा। उनके काव्य सृजन में चित्रों की अकथनीयता शब्दों का रूप ले लेती रही तो चित्र रचना में कविता का सत्व समाहित हो जाता रहा। यद्यपि बहुत-सी चीजें शब्दातीत होकर उन्हें झंकृत करती रहीं, पर कई बार भावाभिव्यक्ति के लिए शब्द उन्हें छोटे मालूम पड़ते रहे और रेखाएं, रंग और आकृतियां बड़ी। बस शायद इसीलिए गुप्त जी की लेखनी और तूलिका से सृजित सर्जनात्मक सृष्टि में कविता और चित्रकला समानांतर होते हुए भी कदाचित चित्रात्मक बड़ी हो जाती थी और चित्रकार जगदीश गुप्त, कवि जगदीश गुप्त से गुरुतर।
सन् 1924 में शाहाबाद, हरदोई में जन्में जगदीश गुप्त ने मुख्यतः इलाहाबाद को ही अपना कर्मक्षेत्र बनाया और अपने घर के ठीक पास गंगा किनारे स्थित नागवासुकि मंदिर के अहाते में या फिर सीढ़ियों पर बैठकर गंगा के शांत, सौम्य और सौंदर्यमूलक सान्निध्य में उन्होंने अपने भावों को शब्द दिए तो रेखाओं और रंगों से उन्हें एक संपूर्ण आकार-प्रकार भी।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम0ए0, डी0 फिल व चित्रकला एवं संस्कृत में डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने साहित्य वाचस्पति की उपाधि भी प्राप्त की। वर्ष 1950 से विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन कार्य और बाद में विभागाध्यक्ष रहकर 1986-87 में अवकाश प्राप्त करने के बाद वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की उच्च शोध की विशेष योजना के अंतर्गत कार्यरत रहे।
नई कविता के प्रवर्तक रहे जगदीश गुप्त को कविता का संस्कार माखन लाल चतुर्वेदी से मिला तो बंगाल शैली के अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त चित्रकार क्षितींद्र नाथ मजूमदार से उन्होंने चित्रकला की शिक्षा ग्रहण की। कविता और चित्रकला का साहचर्य निरंतर उनके जीवन में अंतर्व्याप्त रहा। ‘परिमल’ और नई कविता के दौर में साकार हुई उनकी सृजनशीलता को रंग व रेखाओं ने भी समृद्ध किया।
‘कवि वही जो अकथनीय कहे’ की अवधारणा रखने वाले डा0 गुप्त के काव्य-सृजन में चित्रों की अकथनीयता शब्द का रूप् ले लेती रही तो चित्र रचना में कविता सत्व समाहित हो जाता रहा। दूसरे शब्दों में कहें तो डा0 गुप्त का मानना था कि कला व कविता के संस्कार उन्हें जन्मजात रूप से मिले और भृगुवाणी ने उन्हें कालातीत आयाम दे दिया।
डा0 गुप्त के लिए कल्पना कभी अयथार्थ नहीं रही। उसका तर्कातीत रूप उनके अंतरंग अनुभवों को रूपायित करने में सहायक रहा है। भारतीय कला के इस सूत्र वाक्य ने उन्हें हमेशा प्रेरणा दीः
श्रेखां शंसत्याचार्याः वर्तनां च विचरणः
स्त्रियों भूषणमिच्छांति, वर्णाख्यमितरे जनाः।
माध्यम, शैली, रूप विन्यास-किसी ने उन्हें कभी परिसीमित नहीं किया, बल्कि चित्रण की प्रेरणा निरंतर उनके भीतर सीमाएं तोड़ती रही हैं।
डा0 गुप्त की चित्रात्मकता का मूल उद्देश्य प्रत्येक स्तर पर मनुष्यता की रक्षा का प्रयास करना रहा। डा0 गुप्त कला के पीछे मनुष्यता की तलाश करते रहे। कवि व चित्रकार दोनों ही रूपों में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराने वाले डा0 गुप्त सबसे पहले अपने आप को चित्रकार मानते थे और कविता को दूसरी ताकत। उनकी कविता में बहुत सारे चित्र हैं और उनके चित्रों में बहुत सारी कविताएं। वह कहा करते थे कि ’चित्रकला सब कलाओं की आंख है’। डा0 गुप्त द्वारा बनाए गए लगभग दस हजार रेखाचित्र उनकी यात्राओं, संघर्षों और सस्मरणों के जीवित दस्तावेज हैं।
डा0 जगदीश गुप्त का कलाकर्म, साहित्य व चित्रकला के बीच एक सुंदर सेतु है। डा0 गुप्त के रेखांकन में उनका कवि रूप बोलता है, इसीलिए उनके चित्र एक सुंदर कविता जैसे सरस, सरल और प्रिय लगते हैं। और शायद इसी कारण रंगों की नई भाषा और भाव उनके चित्रों में मिलते हैं तो कविताओं में पूरी चित्रात्मकता। काव्यात्मक गरिमा के कारण ही डा0 गुप्त का रेखांकन ‘स्केच’ न बनकर ‘ड्राइंग’ बन जाता था। लेखनी और तूलिका दोनों से रचना सृष्टि करने वाले डा0 गुप्त दोनों माध्यमों को परंपरा से जोड़ते रहे। उनकी ‘कला’ ‘अपना’ साक्षात्कार कराने में केंद्रीय भूमिका का निर्वाह करती है। इतना ही नहीं, कलात्मकता और चित्रात्मकता के कारण ही डा0 गुप्त के लेखन और हस्ताक्षर की शैली भी चीनी और जापानी लिपि के सदृश है। इसीलिए वह अपने चित्रों के शीर्षक या उनका परिचय देते समय क्षैतिजता से परे ऊर्ध्वाधर शैली में लिखते रहे।
जगदीश गुप्त अन्वेषी कला दृष्टि के भी धनी थे और इसीलिए उन्होंने प्रागैतिहासिक चित्रकला के स्वतः प्रेरित विशिष्ट अनुशीलन क्रम में भारत के विभिन्न भागों में स्थित बहुसंख्यक अज्ञात शिलाश्रयों एवं गुफाओं की प्राथमिक खोज भी की और वहीं बैठकर शिलाचित्रों की अनुकृतियों का चित्रांकन व रेखांकन भी। उन्होंने मृण्मूर्तियों व अन्य पुरातन सामग्री का संचयन किया तो आधुनिक, साहित्य, मूर्तिकला तथा चित्रकला के समान तत्वों की लयात्मकता व सृजनात्मकता का अध्ययन एवं विश्लेषण भी किया। जगदीश गुप्त मानते रहे कि सर्जक के पास दो दृष्टियां होती है, एक वह जिससे वह अपनी रचना को मूर्त रूप देता है और दूसरी वह जिससे वह अपनी कृति को परखता है, उसका विश्लेषण करता है। रचना को ही प्रमुख मानने वाले गुप्त जी के अनुसार अपूर्व निर्धारित रचनाक्रम में स्वतंत्रता अनिवार्य है। उनका मानना था कि मानव विकास में निजी अनुभव, निजी प्रतिभा सबसे अधिक सहायक होती है।
साहित्य के लिए पूर्णतः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर जगदीश गुप्त मानते रहे कि पूरा समाज, साहित्य का समाज नहीं है बल्कि साहित्य का समाज वह है जो कि कला की बारीकियों तक जाता है।
‘परिमल’ के संस्थापकों में से एक जगदीश गुप्त स्पष्ट शब्दों मे जोर देकर कहते थे कि ‘परिमल’ ने अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य को प्रमुखता दी और इसीलिए जब लगा कि परिमल की पूर्णता है, ’परिमल’ को विराम दे दिया। कुछ ऐसा ही नई कविता के साथ भी हुआ। नई कविता के आठ अंक निकले और फिर विराम।
रचनाकर्म और परिवेश के प्रश्न पर डा0 गुप्त बहुत बेबाकी से स्वीकारते थे कि इलाहाबाद में आज भी साहित्यिक परिवेश है और यहां जो साहित्य सृजन हो जाता है वह राजधानियों में बैठकर संभव नहीं। उनका मानना था कि, वहां जो साहित्यकार हैं वे या तो चाटुकार हैं या नेताओं के कृपापात्र।
गुप्त जी नई कविता (संपादन), नाव के पांव, गुजराती और ब्रजभाषा कृष्णकाव्य का तुलानात्मक अध्ययन, शब्ददंश, रीतिकाव्य संग्रह, छंदशती, शंबूक, नवधा, मां के लिए, सांझ, जयंत, शान्ता और कवितांतर, त्रयी (संपादन) सहित लगभग तीन दर्जन कृतियों को रचा है तो इससे अलग प्रागैतिहासिक भारतीय चित्रकला नामक उनकी पुस्तक इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी के माध्यम से उच्चकोटि का गंभीर अध्ययन किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त उनकी भारतीय कला के पदचिह्न नामक पुस्तक भी उल्लेखनीय है।
कई महत्वपूर्ण पुरस्कार, सम्मान प्राप्त कर चुके कला अन्वेषी, कवि व चिंतक जगदीश गुप्त के भीतर मौलिकता और ऊर्जा के साथ कवि-चित्रकार प्रकृति एवं मानवीय संवेदना को आलोड़ित करता रहा। अपनी रचनाओं और अप्रतिम हिन्दी सेवा की उपलब्धियों के साथ वह हमेशा हमारे बीच मौजूद रहेंगे। बस उनकी यही पहचान उन्हें सबसे अलग करते हुए विशिष्टता प्रदान करती है।
कई महत्वपूर्ण पुरस्कार, सम्मान प्राप्त कर चुके कला अन्वेषी, कवि व चिंतक जगदीश गुप्त के भीतर मौलिकता और ऊर्जा के साथ उद्घाटित कवि-चित्रकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ प्रकृति एवं मानवीय संवेदना को आलोड़ित करता रहा। अपनी रचनाओं और अप्रतिम हिन्दी सेवा की उपलब्धियों के साथ वह हमेशा हमारे बीच मौजूद रहेंगे। बस उनकी यही पहचान उन्हें सबसे अलग करते हुए विशिष्टता प्रदान करती है।
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जो स्वतः मिल जाए, वही सम्मान है !
प्रख्यात कवि, चित्रकार जगदीश गुप्त को जब उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का प्रतिष्ठित भारत भारती सम्मान देने की घोषणा की गई तो उसे उन्होंने अत्यंत सहजता और सम्भाव से स्वीकार किया। प्रस्तुत है रचना और रचनाकार के सरोकारों के संबंध में इस अवसर पर उनसे की गई बातचीत के प्रमुख अंशः
प्रश्नः भारत भारती सम्मान मिलने पर आप कैसा अनुभव कर रहे है?
उत्तरः पहले मुझे मध्य प्रदेश का प्रतिष्ठित मैथिलीशरण गुप्त सम्मान मिला और अब उ. प्र. से ‘भारत भारती’। जब मेरे सहपाठी, मित्र, कवि भारती जी थे तब हम कहा करते थे –‘भारत में गूंजे हमारा भारती।’ लेकिन अब, जब भारती जी हमारे बीच नहीं हैं तो भगवान से मैं यही प्रार्थन करता हूं कि ‘भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती।’
प्रश्नः पुरस्कार और सम्मान में मौलिक अंतर क्या है?
उत्तरः जो स्वतः मिल जाए, वह सम्मान है। पुरस्कार शब्द मुझे उचित नहीं लगता। वस्तुतः पुरस्कार शब्द का अर्थ है-जो अपरिचित है, उसे सामने लाना। किन्तु जो सुपरिचित है उनके लिए पुरस्कार शब्द ठीक नहीं, सम्मान शब्द ही उचित है।
प्रश्नः आपके लिए कविता अभिव्यक्ति का एक माध्यम हैं तो चित्रकला दूसरा। दूसरे शब्दों मे आप कविता को अभिव्यक्ति की चुनौती मानते हैं और कला को बहुलोचना नदी। लेकिन इनमें से प्राथमिकता किसे देते हैं।
उत्तरः वस्तुतः कविता भाषा की स्थिति को मानकर चलती है। बिना भाषा के न तो साहित्य हो सकता है और न ही कविता। इतना ही नहीं, भाषा को भी भारतीय दर्शन में चार रूपों में देखा गया है- परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी। वैखरी सामान्य व्यवहार में आती है जबकि मध्यमा उसके ऊपर। सच तो यह है कि पष्यंती काव्य दृष्टि से उपतजी है, जहां शब्द, शब्द न रहकर दृश्य बन जाते हैं। पर इससे अलग परा कोटि तक शायद ही कोई कवि पहुंचता है क्योंकि परा न सिर्फ साधनापरक है अपितु वह ध्यान की स्थिति मानी जाती है।
प्रश्नः आंख आपके चित्रों का प्रमुख विषय है। आंखों के अनेक अच्छे भाव वैचारिक स्तर पर आपके चित्रों को एक विशिष्ट अर्थ देते है। आपके चित्र उनकी जिजीविषा के स्रोत है। आंखों को प्राथमिकता देने के पीछे अपकी दृष्टि क्या है?
उत्तरः वस्तुतः देखना प्राथमिक है जबकि सुनने का अनुभव उसके बाद आता है। एक मान्यता के अनुसार, ‘चित्रकला सब कलाओं की आंख है।’ कलाएं दृश्यत्तक रूप् में प्रकट होती है जबकि काव्य, शब्द माना जाता है। वैसे दृश्यकाव्य की भी कल्पना नाटक के रूप् में की जाती है। इसीलिए मैं चित्रकला को प्राथमिकता मानता हूं और कविता को उसके बाद। लेकिन साहित्य में कविता सर्वोपरि है। इससे अलग आंख-सौंदर्य की जो चेतना प्रदान करती है वह सगुण तक जाती है किंतु भाषा स्वप्न चेतना में विलीन हो जाती है।
प्रश्नः कई बार आपको शब्द छोटे लगते हैं और रेखाएं बढ़ी। ऐसा क्यों?
उत्तरः वस्तुतः लिखना शब्द चित्र के लिए भी प्रयुक्त होता है और लिपि के लिए भी। और लिपि में भी आकर निहित रहता है। अब देखिए, चीनी लिपि रूपतामक होती है तो सिंधुघाटी लिपि में भी मानवाकृतियां निहित है। वस्तुतः यह विषय ही एक स्वतंत्र जिज्ञासा का है।
प्रश्नः कविता पर प्रायः यह आरोप लगाया जाता है कि वह समकालीन लेखन की कसौटी नहीं बन पाती है। इस बारे में आपका क्या मानना है?
उत्तरः मैं ऐसा नही मानता। वस्तुतः कविता में युग व युगांतरकारी चेतना-दोनों एक साथ रहती है। अब यह कवि की सीमा है कि वह अपनी अभिव्यक्ति को कितनी दूर तक पहुंचा सकता है।
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“जीवन में समग्रता किसी बड़े साहित्य की प्रेरणा होती है ! ”
कवि चित्रकार जगदीश गुप्त से धनंजय चोपड़ा की बातचीत
कवि व चित्रकार जगदीश गुप्त भले ही अपने जीवन के पचहत्तर वर्ष पूरे करने जा रहे हों, पर अपनी संवेदनाओं को व्यक्त करने का एक भी अवसर नहीं गंवाना चाहते। वह आज भी उतने ही सक्रिय हैं जितने अपने युवा दिनों में थे।
जगदीश गुप्त ने कविता का संस्कार यदि माखन लाल चतुर्वेदी से प्राप्त किया तो लगभग तीस वर्ष महाप्राण निराला के साथ बिताए। यही कारण है कि उनकी वाणी और व्यवहार में उसी तरह की फक्कड़ता और सृजन के प्रति समर्पण भाव देखने को मिलता है। गुप्त जी ने हिन्दी साहित्य को यदि ’नई कविता’ दी है तो चित्रकला को कवि हृदय की संवेदनाओं से सहेजा भी है। प्रगैतिहासिक चित्रकला के स्वतः प्रेरित विशिष्ट अनुशीलन क्रम में भारत के अज्ञात शिलाश्रयों एवं गुफाओं की खोज करने और शिलाचित्रों की अनुकृतियों का अंकन करने का महत्वपूर्ण कार्य भी उन्होंने किया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें हाल ही में ’भारत भारती’ सम्मान प्रदान किया है। प्रस्तुत है जगदीश गुप्त से बातचीत:
आप अपने को कवि अधिक मानते है या फिर चित्रकार?
कविता और चित्रकला दोनों युगपथ के रूप में मेरे भीतर एक स्त्रोत के रूप में प्रवाहित होते रहे हैं। कविता मेरे लिए अलग से प्रेरणा स्त्रोत कभी नहीं रही। यही नहीं, समग्र दृष्टि मेरी कविता व चित्रकला तक ही सीमित नहीं है, प्रागैतिहासिक चित्र भी मुझे निरंतर प्रेरित करते रहे हैं। जड़ों तक जाने की प्रेरणा मेरे भीतर आरंभ से ही रही है। वास्तव में अतीत में फैली हुई जड़ों तक पहुंचकर उसके निजी रूप को पहचानना तथा उसे नई चेतना प्रदान करना आवश्यक है। मेरा मानना है कि चित्रकला सभी कलाओं की आंख है।
एक समय निराला, पंत, महादेवी का था और एक आज का समय है। आप तो दोनों ही समय के साक्षी रहे हैं। कैसा बदलाव पाते हैं?
बदलाव तो बहुत आ गया है। वास्तविकता यह है कि परिवेश की चेतना प्रेरणा देती है किन्तु वह प्रेरणा का स्रोत नहीं होती। अंतर्जगत में कुछ निरंतर घटित होता रहता है, जिसमें एक बेचैनी होती है अकथनीय को कह डालने की। मेरा मानना है कि रचना प्रक्रिया केवल श्रमात्मक नहीं होती है। निराला जी ने कठिन से कठिन परिस्थितियों में किसी कर्म को हेय नहीं माना। उसके भीतर उत्सर्ग की भावना थी। वह समाज से जो लेना चाहते थे, लेते थे लेकिन भीतर समाज को उससे कहीं अधिक देने की भावना निहित थी। ऐसे ही लोगों से बना था उस समय का साहित्यिक परिवेश। अब ऐसा कम ही देखने को मिलता है।
साहित्य व समाज के रिश्ते पर आपके क्या विचार हैं।
समाज पर साहित्य का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है उस समाज का व्यक्ति समाज, संस्कृति व जीवन के प्रति क्या दृष्टिकोण रखता है। फिलहाल यह तो कहा ही जा सकता है कि साहित्य का समाज पर प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है। संचार क्रांति के चलते लोगों में पुस्तक पढ़ने की आदत कम होती जा रही है। दूसरी ओर यह भी कहना पड़ेगा कि साहित्य का समाज पूरा समाज नहीं होता। जो समाज भाषा की बारीकियों तक जाता है वह साहित्य का समाज होता है।
साहित्य और समाज में गिरते मूल्यों पर आपके क्या विचार है?
स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान एक अद्वितीय प्रेरणा कार्य कर रही थी, जिसमें उत्सर्ग और बलिदान की भावना सर्वोपरि थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वह स्थिति नहीं रही। कुछ लोगों का कहना है कि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विवश होकर अंग्रेजों को स्वतंत्रता देनी पड़ी, किन्तु औपनिवेशिकता आज भी भारतीय जनमानस में समाप्त नहीं हुई। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि राष्ट्रभाषा के स्थान पर हिन्दी को राजभाषा का रूप प्राप्त हुआ और वह भी 14 सितंबर की औपचारिकता के साथ। देश उत्तरोत्तर विडंबनाओं से ग्रस्त होता जा रहा है। गरीबी की रेखा की चिंता तो बहुतों को है किंतु उच्च वर्ग उसे बनाए रखने में ही अपना हित समझता है। वास्तव में आज की मानसिकता खंडित मानसिकता है और इसी के चलते ही मेरा नया कविता संग्रह आक्रोश के पंजे उत्पन्न हुआ है। वास्तविकता तो यह है कि पहले आक्रोश विदेशियों के प्रति था और अब आक्रोश अपने ही लोगों के प्रति है। ये सारी स्थितियां असाधारण हैं। साहित्य और कला अपने को नई तरह से परभाषित करने को बाध्य है।
इधर कुछ वर्षों में ‘चरित्र हनन’ का आरोप सहने वाली रचनाओं का सृजन अधिक हुआ है। इसे आप किस रूप में देखते हैं।
साहित्य का सौंदर्यबोध एक आंतरिक विवेक से परिचालित होता है, जिसमें शिव और अशिव दोनों की पहचान होती है। सौंदर्य की धारणा सत्य पर आधारित है लेकिन फिर भी शिव की चिंता करना मात्र ही अशिव से मुक्ति का रास्ता नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि जीवन में समग्रता किसी बड़े साहित्य में प्रेरणादायक होती है और साहित्यकार की विवेकशीलता इसी से पहचानी जाती है।
रचनाकर्म से जुड़े संगठनों पर आपके विसचार है?
सच तो यह है कि रचना कर्म से जुड़े संगठनों में विघटन अधिक है, संगठन कम। जितनी संस्थाएं हैं, उनका विकास गोष्ठियों में तो मिल जाता है लेकिन बाहर अजीब-से खालीपन का शिकार हैं ये संस्थाएं। वास्तव में साहित्य मुक्त एवं स्वातंत्र भाव से होना चाहिए। हम लोगों ने ‘परिमल’ संस्था गठित करके इसी भाव को महत्व दिया। यहां मैं यह कहना जरूरी समझता हूं कि ‘परिमल’ खत्म नहीं हुआ, हमने खत्म किया उसे। मैं हमेशा यह कहता हूं कि फूल खिलते-खिलते मुरझाने लगता है तो उसे रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
नई कविता आंदोलन में आपने अग्रणी भूमिका निभाई। इस संदर्भ में भी कुछ बताइए।
निराला जी कविता को सनयन कहते थे और यह बात मेरे मन को गहराई से स्पर्श करती थी। कविता केवल सुनने की वस्तु नहीं है, देखने की भी वस्तु है। ‘नई कविता’ में मैंने इस बात का ध्यान में रखकर बिंब विधान पर विशेष बल दिया, ठीक वैसे ही जैसे छायावाद में प्रतीकों को केंद्र में माना गया। मेरा स्वाभाव कविता को नए-पुराने रूप में विखंडित करने का कभी नहीं रहा।
‘नई कविता’ को ध्यान में रखकर मैंने पुस्तक भी प्रकाशित की। ‘नई कविता’ का पहला अंक सन 54 में प्रकाशित हुआ और आठवां सन 67 में। कवियों का इतना अदृश्य सहयोग मिला कि मैं स्वयं चकित था। नई कविता के लिए मुझे नया सौंदर्यशास्त्र रचना पड़ा क्योंकि नये शब्द की परिभाषा नए रूप में करने का आग्रह था। ‘न्यू पोयट्री’ की पाश्चात्य धारणा ठीक वैसी नहीं थीं जैसी कि ‘नई कविता’ में आई। भरतेंदु से लेकर मैथिलीशरण गुप्त तक और फिर गुप्त जी से लेकर अज्ञेय तक, दृष्टियां बदलती रहीं। तार सप्तक के चार संकलन हिंदी कविता के ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। त्रयी के रूप में मैने भी तीन संकलन प्रकाशित किए और चौथा-पांचवा आगे आने को है।
नई पीढ़ी के प्रति आप कितने आशावान हैं?
मुझे नई पीढ़ी से बहुत अधिक आशाएं हैं। वास्तव में हर कवि पुरातन को देखता है किंतु अपनी वाणी की सार्थकता भविष्य में पहचानता है। काल की चेतना अखंड होती है नहीं तो साहित्य की लयात्मकता खंडित हो जाती है।
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डॉ. जगदीश गुप्त से
बतकही : संस्कृति से नई कविता के उन्मेष तक
भेंटकर्ता —उमेश चौहान
‘नई कविता’ के जनक और सर्जक डॉ.जगदीश गुप्त से पिछले दिनों अनायास ही, नैनीताल स्थित प्रशासकीय प्रशिक्षण संस्थान में भेंट हुई, तो शाम को उनके साथ बैठकर साअहित्यिक चर्चा का संयोग भी मिला | छः सौ वर्षों के इतिहास में हिन्दी साहित्य भारतीय समाज को क्या दे पाया | कितना आगे बढ़ा | कितना प्रासंगिक एवं अर्थमय बना | कई सारे प्रश्न बातचीत का विषय बने | बातचीत “नई कविता” की प्रसंगिकता एवं उपयोगिता पर भी हुई | यहाँ प्रस्तुत है, हिन्दी साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर डॉ. जगदीश गुप्त के विचार|
डॉ. गुप्त साहित्य को संस्कृति का संरक्षक मानते हैं | संस्कृति केवल विलास या सामयिकता की वस्तु नहीं है, बल्कि वह आत्मसंस्कार का हेतु है | अखंड है एवं शाश्वत है | संस्कृति स्थाई मूल्यों को स्थापित करती है | साहित्य जीवन से सम्बद्ध है, क्योंकि उसमें लयात्मकता है एवं तरलता है | संस्कृति परमुखापेक्षी नहीं है, एवं आरोपित भी नहीं है | संसार को अपने आप की परख जब आ जाए, जब उसमें सहज भाव का समावेश हो जाए, तब संस्कृति पुष्ट हो जाती है |
हिन्दी साहित्य के ऐतिहासिक उन्मेष पर दृष्टि डालते हुए डॉ. गुप्त भक्ति साहित्य की श्रेष्ठता की पुष्टि करते हैं | उनके विचारों में भक्ति साहित्य मन की शुद्धता पर बल देता है और शुद्ध मन ही आनांद का निकेत है | यह विचार धारा विश्व के अन्य साहित्यों में अनिवार्य या सिद्धान्त रूप में नहीं है | भारतीय साहित्य सृजन की कल्पना है | हमारे देशज भाव दर्शन के लिए हैं. प्रदर्शन के लिए नहीं | अंतर्दृष्ति सम्पन्न अनुभव भारतीय साहित्य की विशेषता है |
डॉ. गुप्त हिन्दी भाषा को, समास्त भाषाओं से अधिक सामर्थ्यवान एवं पुष्ट मानते हैं | वे कहते हैं कि हर साहित्य किसी न किसी भाषा में होता है और हिन्दी भी उनमें से एक है | उसका अन्य भारतीयभाषाओं से अलगाव संभव नहीं है | इनमें आदर्श की चेतना परिध्याप्त है | आदर्श की कसौटी आचरण है, उपदेश देना नहीं | प्रेमचन्द का यथार्थवाद आदर्शोमुन्ख यथार्थवाद है | गांधीवाद से प्रेमचन्द का अलगाव आदर्शवाद की इति नहीं थी, उसका तत्व अप्रत्यक्ष रूप से सामने आता है | उसकी शैली, बोली एवं स्वरूप निरंतर परिवर्तित एवं परिवर्द्धित होते रहे हैं | पूर्व एवं पश्चिम के भाषाई प्रसार को हिन्दी ही समंवित करती है | राजस्थान की मीरा ने उत्तर भारत की ब्रजभाषा में रचना की और गुजरात तक लोकप्रिय हुई | उड़ीसा में चैतन्य ने जो धारा प्रभावित की वह बंगाल से बिहार तक फैल गई | कबीर ने दक्षिण से भक्ति की भावना ग्रहण कर ज्ञान एवं वैराग्य से समंवित कर उसे संपूर्ण उत्तर भारत में फैला दिया | (भक्तिद्रावणी उपजी, लाए रामानंद | प्रगट किया कबीर ने सप्तदीप नवखंड) | इस प्रकार हिन्दी ही भारतीय वैचारिकता में एकात्मता लाने का माध्यम बनी |
डॉ. गुप्त, हिन्दी को किसी एक जाति, वर्ग, या धर्म की भाषा नहीं मानते | तुलसी, जायसी आदि के साहित्य में हिन्दी कहीं भी ‘हिन्दू’ की भाषा के रूप में नहीं है | वह मनुष्य मात्र की भावनाओं का ही प्रतिनिधित्व करतीहै | प्रतिक्रियावश यदि काहीं कुछ लिखा भी गया हो तो उसे तो गौंण ही मानना पड़ेगा | प्रमुख तो क्रियाशील साहित्य ही है |
डॉ. जगदीश गुप्त हिन्दी साहित्य में वैदिक चेतना का प्राधान्य मानते हैं | वेद सत्य के अन्वेषी हैं, और उसे अनावरित करते हैं | वेदों को लोक चेतना से जोड़ने का कार्य पुराणों ने किया | आर्यसमाजी इस बात को नहींमानते | अवतारवाद एवं मूर्ति पूजा के बजाय, वर्तमान संस्कृति मानववाद पर आधारित है | वर्तमान संस्कृति, प्राचीन धर्म को स्थानापन्न करती है |
आधुनिक साहित्य में कविता का अवमूल्यन होना, डॉ. गुप्त स्वीकार करते हैं | वे मानते हैं कि कविता का दायरा संकुचित हो गया है, और जैसे-तैसे वह जीवित है | ऐसी अन्य कई विधाएं निकल आई हैं, जिनमें अभिव्यक्ति अधिक स्पष्ट एवं आसान हो गई हैं | रसात्मकता का कविता में हृास उसे समाज से जोड़्ने में बाधक रहा है | “नई कवित” मंच पर सफल नहीं है, क्योंकि नई कविता में प्रदर्शन की मानसिकता नहीं है बल्कि अनुभव का प्राधान्य है | काफी कुछ आब भी बचा है, जिसके लिए कविता की आवश्यकता है | हाँ, जो बात अन्य विधाओं में कही जा सकती हि, उसके लिए कविता का औचित्य अब नहीं है | आधुनिक कविता पर पलायनवादी होने का आरोप है | परन्तु कविता पलयन नहीं है | कविता युद्ध तक जाती है और उसका होना उच्चतम सांस्कृतिक कर्म का होना है |
यह पूछने पर कि क्या ‘नई कविता’ तार्किकता एवं बौद्धिकता के अतिरेक से दुरूह नहीं हो गई है | डॉ. गुप्त बताते हैं कि कविता में तार्किकता का होना उसकी गंभीरता एवं सच्ची अनुभूति का परिचायक है | वह श्रोता या पाठक को अपने साथ बहा ले जाना नहीं चाहती है | --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
डॉ. गुप्त की अभिव्यक्ति का एक अन्य मध्यम रहे हैं— उनके रेखाचित्र | मानवमन की सूक्ष्म भावनाओं को रेखाओं द्वारा व्यक्तकरने में डॉ. गुप्त सिद्धहस्त हैं औए वे इस प्रवृत्ति को कविता-कला का पूरक एवं संवर्धक मानते हैं |उनका स्वयं का जीवन एवं उनकी मिली-जुली कृतियां, जैसे “युग्म” इसकी गवाह हैं |
कविता में आधुनिकता-बोध के बारे में डॉ. गुप्त के विचार काफी रोचक हैं | वे निर्जीव एवं उधार की आधुनिकता को साअर्थक नहीं मानते हैं | आधुनिकता अपने प्रवाह में स्पष्ट होकर जब सजीव हो जाती है तभी सार्थक होती है | जो आधुनिकतादेश से, व जनमानस से, हमें जोड़ती है, वही सच्ची आधुनिकता है | इस संदर्भ में वे मानते हैं कि प्राचीन-हिन्दी साहित्य भी आधुनिकता-बोध से रहित नहीं था | वे भक्तिकाल में तुलसी की इन पंक्तियों में आधुनिकता खोज निकालते हैं—“लव निमेस्परिमाण जुग, बरस कलप सर चंड | भजसि न मन तेहि राम कहं, कालहु जाकर दंड ||” कल्पना की आधुनिकता सही मानों में शाश्वत होती है, तथा सदैव नवजात सी लगती है | भिखारीदास की इन पंक्तियों को इन पंक्तियों को वे ऐसी ही आधुनिकता के रूप में उद्धृत करते हैं—
“होत मृगादिक ते बड़े बारन, बारन वृन्द पहारन हेरे |
सिंधु में केते पहार परे, पुहुमी में विराजत सिंधु घनेरे |
लोकन में पृथ्वी त्यों किती, हरियोदर में बहु लोक बसेरे |
ते हरि, “दास” बसे इन नैनन, एते बड़े दृग राधिका केरे ||”
डॉ. गुप्त साहित्य को कालजयी मानते हैं | वह आधुनिक या पुरातन नहीं होता है | विभिन्न भारतीय भाषाओं एवं लिपियों को बीच में व्याप्त अन्तर्संघर्ष से होने वाली साहित्यिक प्रगति की क्षति के बारे में पूछे जाने पर, डॉ. गुप्त वर्तमान स्थिति को संतोषजनक बताते हैं | भारतीय भाषा साहित्य लिपियों के अवगुंठन से अलग होकर सामने आ रहा है | भारतीय ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी तथा भारतीय विद्या-भवन जैसी संस्थाएं स्वातंत्रोत्तर युग में भारतीय साहित्य को एक समंवित धरातल पर लाने में सफल हुई हैं |
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नये मनुष्य की प्रतिष्ठा के पक्षधर हैं डॉ. गुप्त
साक्षात्कारकर्ता : —प्रभात ओझा / ‘आज’ इलाहाबाद 29 जून 1992
इलाहाबाद | कविता और चित्रकला के समान साहचर्य वाले कवि डॉक्टर जगदीश गुप्त नयी कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर ही नहीं उसके नियामकों में माने जाते हैं | परन्तु वह अपने व्यक्तित्व के संगठन में कतिपय विरोधी तत्वों के कारण भी चर्चित हैं | छायावादी रोमांटिक गीतितत्व रीतिकालीन मुक्तकों के शिल्पविधान और आधुनिक संवेदना के बौद्धिक अनुभव उनकी कविताओं में एक साथ देखे जा सकते हैं | अज्ञेय की तरह डॉक्टर जगदीश गुप्त भी नयी कविता को परम्परा से कटी हुई नहीं मानते उसे वह एक क्रमिक विकास का ही प्रतिफल निरुपित करते हैं |
डॉक्टर गुप्त का मानना है कि नयी कविता आंदोलन एक उन्मेष के साथ आया पुरानेपन को तोड़कर उसने अपना व्यापक आधार ग्रहण किया | यहाँ हम मुक्तछंद को ले सकते हैं | हालांकि छंदमुक्तता निराला एवं पंत के काव्य में पहले से ही चली आ रही थी परन्तु नयी कविता के द्वारा यह सहज मान्य हो गया गुप्त जी उन कवियों में हैं जिन्होंने मुख्तछंद अपनाने के साथ अन्य काव्य रूपों को भी नहीं छोड़ा | गीत और प्रबंधात्मक रूप से भी वह जुड़े रहे | लम्बी कविता का स्वरूप भी नयी कविता में विकसित हो चुका था | इसमें पारिवारिक संदर्भ ग्रहण किये गये | निराला की ‘सरोज-स्मृति’ कविता की तरह डॉक्टर गुप्त ने हाल ही में अपनी माता के प्रयाण के बाद ‘माँ के लिये’ लिखा जिसका तमिल और गुजराती में भी अनुवाद हो चुका है |
नयी कविता को सामान्य रूप से ब्रजभाषा के विरुद्ध खड़ी बोली की नयी भंगिमा के रूप में देखा गया | अप्रत्यक्ष रूप से महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त और सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकारों ने भी ब्रजभाषा का विरोध कर हिन्दी को उन्नत करने के समर्थकों को सम्बल प्रदान किया | प्रगतिवादियों ने तो सीधे नयेपन का अर्थ ब्रजभाषा के विरोध से माना | भारतेन्दु मंडल के सारे कवियों का दूसरी ओर यह मत था कि काव्य भाषा के रूप में ब्रजभाषा का विरोध नहीं होना चाहिए | नयापन इसे समाप्त कर नहीं लाया जाअ सकता | इस धारा को बाद में श्रीधर पाठक ने जारी रखा था एवं इसी परम्परा में महादेवी वर्मा और नयी कविता में जगदीश गुप्त शामिल हुए | सत्यनारायण कविरत्न, जगन्नाथ दास रत्नाकर और डॉक्टर रसाल की तरह जगदीश गुप्त भी ब्रजभाषा को समान रूप से अपनाये रहे | फुटकर रचनाओं के अतिरिक्त ‘छंदशती’ नामक उनकी पुस्तक ब्रजभाषा में रची |
अपने काव्य में नये पन एवं उसकी भाषा में नये और पुराने दोनों का निर्वाह करने वाला कवि समकालीन सामाजिक संदर्भों से कटा हो, यह कभी नहीं लगा | पूरा देश अपातकाल का संत्रास झेल रहा था उन्होंने ‘शम्बूक’नामक काव्य लिखा | शासन के प्रति आक्रोश व्यक्त करने के लिये राम उपलक्ष बने—
“हे राम तुम्हारी रची रक्त की भाषा में
हर बार तुम्हीं से कहता है शम्बूक मूक
तज वेद-पथ, वर्ण भेद-पथ अपनाकर
मानवा समाज की उर्द्धवमुखी मर्यादा से तुम गये चूक ||”
.....................................................
“जो व्यवस्था व्यक्ति के सत्कर्म को भी मन ले
अपराध
जो व्यवस्था फूल को खिलने न दे निर्वाध
जो व्यवस्था वर्ग सीमित स्वार्थ से हो ग्रस्त
वह विधर्म घातक व्यवस्था शीघ्र ही हो अन्त |
..............................................
राज्य जो संस्कृति रहित है, दर्प है
डसेगा मानव नियति को सर्प है |”
ऐसा कवि नयी कविता आन्दोलन का स्वर धीमा होने के बावजूद अप्रासंगिक नहीं हुआ क्योंकि वह मानता रहा कि आन्दोलन और काव्य धारा दोनों अलग है | तथा काव्य धारा नयेपन की चेतना के साथ चलती रहेगी | नयी कविता के प्रतिष्ठापित हो जाने के बाद उसके मूल स्वर ‘नये मनुष्य की प्रतिष्ठा’ का अभियान जारी रहेगा | डॉक्टर जगदीश गुप्त मानते हैं— “नया मनुष्य रूढ़िग्रस्त चेतना से मुक्त, मानाव मूल्यों के रूप में स्वातंत्र्य के प्रति सजग, अपने भीतर अनारोपित सामाजिक दायित्व का स्वयं अनुभव करने वाला, समाज की समस्त मानवता के हित में परिवर्तित करके नया रूप देने के लिये कृत संकल्प,कुटिल स्वार्थ भावना से विरत, मानव मात्र के प्रति स्वाभाविक सह अनुभूति से युक्त संकीर्णताओं एवं कृत्रिम विभाजनों के प्रति शोभ का अनुभव करने वाला, हर मनुष्य को जन्मतः समान मानने वाला, मानव व्यक्तित्व को उपेक्षित, निरर्थक और नगण्य सिद्ध करने वाली किसी भी दैविक शक्ति या राजनैतिक सत्ता के आगे अनवनत मनुष्य की अंतरंग सदवृत्ति के प्रति आस्थावान, प्रत्येक व्यक्ति के स्वाभिमान के प्रति सजग, दृढ़ एवं संगठित अंतःकरण संयुक्त, सक्रिय किन्तु अपीड़क, सत्यनिष्ठ तथा विवेक सम्पन्न होगा | अगर कवि के आत्मरंजन, भावाभिव्यक्ति एवं संवेदन संप्रेषण के अतिरिक्त कविता का कोई इतर उद्देश्य हो सकता है, तो कहनाहोगा कि ऐसे मनुष्य की प्रतिष्ठा करनाही नयी कविता का उद्देश्य है |”
अद्यतन सक्रिय ऐसे डॉक्टर जगदीश गुप्त को उनकी उच्च स्तरीय उपलब्धि, रचनात्मक श्रेष्ठता एवं सुदीर्घ काव्य साधना के निरपवाद मानदंडों के आधार पर मध्य प्रदेश सरकार का प्रतिष्ठापूर्ण ‘मैथिलीशरणगुप्त सम्मान’ देने का निर्णय किया गया है | यह सुयोग ही कहा जायेगा कि मैथिलीशरण गुप्त जी के जन्म दिन श्रावण शुक्ल तृतीया हरियाली तीज एवं रविवार को ही डॉक्टर गुप्त सम्वत 1981 में पैदा हुये | अपने जन्मस्थान शाहाबाद से जब वह उच्च अध्ययन के लिये यहाँ आये तो यहीं के होकर रह गये और उनकी साधना ने उन्हें राष्ट्रीय व्यक्तित्व प्रदान किया | हिन्दुस्तानी ऐकेडमी के माध्यम से उन्होंने मैथिलीशरण जी के जन्म दिवस को कवि दिवस के रूप में मान्यता दिलाने का अभियान चलाया जिसे उपराष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा ने भी अपनी भागीदारी से स्वीकृति प्रदान की | माखन लाल चतुर्वेदी एवं सनेही जी को काव्यगुरु मानने वाले गुप्त जी दद्दा मैथिलीशरण गुप्त के संदर्भ जोड़कर मध्य प्रदेश सरकार ने उनकी काव्यधारा को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखा है | समीचीन नहीं होते हुए भी यह चर्चा अप्रासंगिक नहीं होगी कि ऐसा कवि जब हृदय की गहन चिकित्सा हेतु लगभग दस महीने से दिल्ली के अस्पताल एवं उसके इर्द गिर्द रहा तब स्थानीय साहित्यकारों के प्रयास के बाद भी प्रदेश सरकार ने उनकी सुधि नहीं ली | इसके विपरीत उनकी सक्रियता में कमी नहीं आयी और अस्पताल के बिस्तर पर भी रेखा चित्रों के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति करते रहे | उनके स्वस्थ सक्रिय जीवन की शुभ कामना के साथ मैथिलीशरण गुप्त सम्मान के लिये बधाई |
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डॉ. जगदीश गुप्त को बांहों में बांध लिया
‘नयी कविता’ के व्याख्याता डॉ. जगदीश गुप्त की लंबी कविता-कृति “मां के लिए’ का तमिल अनुवाद और मद्रास के वरिष्ठ साहित्यकारों तथा विद्वानों की उपस्थिति में तमिल अकादमी के अध्यक्ष द्वारा विमोचन हुआ, इस अवसर पर अन्य गणमान्य दक्षिणी और हिन्दी के विद्वानों के अतिरिक्त श्री सेतुरामन जैसे प्रख्यात कवि ने असाधारण शब्दों में सह्रदयता के साथ ‘मां के लिए’काव्य-भूमि पर हार्दिक प्रशंसा की, यही नहीं एक सहृदय कवि के नाते उत्तर भारत से आये डॉ. जगदीश गुप्त को बांहों में बांध लिया, जो व्यक्ति (कवि सेतुरामन) हिन्दी के विरोध में तीन बार जेल गया हो, उसमें ऐसा भावनात्मक परिवर्तन घटित हो, यह कवि चित्रकार डॉ. जगदीश गुप्त के लिए अकल्पित था, समारोह में बोलते हुए डॉ. जगदीश गुप्त ने कहा ‘भले जही लिपि भाषा-व्यवधान उत्पन्न करती है, किन्तु जो भाषा मैं जानता हूँ वह विश्वजनीन है, क्योंकि चित्रों का अनुवाद नहीं होता, मेरी ‘मां के लिए’ पुस्तक अनुदित हुई है पर मेरा दुर्भाग्य है कि तमिल भाषा में हुए अनुवाद का सौरस्य प्राप्त करने में असमर्थ हूं |
अभी कुछ दिनों पहले ‘भाषा संगम’ के आमंत्रण पर श्री सेतुरामन उत्तर भारत, विशेषतः प्रयाग और काशी सपात्नीक आये, डॉ.के.सी.गौड़ जो ‘भाषा संगम’ के मंत्री हैं, इस भावनात्मक संगम के सूत्रधार बने |
—मजीद अहमद / संडे मेल : 7-13 जून 1992
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नये मनुष्य की प्रतिष्ठा है कविता... डॉ. गुप्त
साक्षात्कार कर्ता : यश मालावीय
वाद-मुक्तता का आग्रह जताने वाले कवि-चित्रकार डॉ. जगदीश गुप्त हिन्दी नयी कविता आंदोलन के प्रणेताओं में से रहे हैं | हाँ, भारतीय कला और ब्रजभाषा की काव्यपरम्परा से गहरे जुड़े होने के कारण नयी कविता में भी अनकी अपनी एक विशिष्ट छवि है | डॉ. गुप्त लम्बे समय से अस्वस्थ चल रहे हैं, लेकिन न उनकी कलम थकी, न तूलिका | हाल में उन्हें मैथिलीशरण गुप्त सम्मान से विभूषित करने की घोषणा हुई है | उनके स्वस्थ एवं दीर्घायु होने की कामना के साथ यहाँ प्रस्तुत है यश मालवीय द्वारा उनसे की गयी एक गैर-रस्मी बातचीत |
विगत 28 जून 92 को नयी कविता के कीर्ति पुरुष डॉ. जगदीश गुप्त को मैथिलीशरण पुरस्कार दिये जाने की घोषणा की गयी | ऐसा महसूस हुआ यह सम्मान समूची हिन्दी कविता का सम्मान है | जगदीश जी कविता लिखते ही नहीं वरन् जीते भी हैं | उनके अनुसार कविता नये मनुष्य की प्रतिष्ठा है | वे कहते हैं —
“ अगर कवि के आत्मरंजन, भावाभिव्यक्ति एवं संवेदन सम्प्रेषण के अतिरिक्त कविता का कोई इतर उद्देश्य हो सकता है, और मैं समझता हूँ कि हो सकता है | तो कहना होगा कि ऐसे मनुष्य की प्रतिष्ठा करना ही कविता का उद्देश्य है |”
इस महत्वपूर्ण पुरस्कार की घोषणा के अगले ही दिन मैं दारागंज स्थित उनके आवास पर गया | वे पिछले दिनों दिल्ली से लौटे हैं | लगभग एक वर्ष से हृदय रोग के कारण उन्हें ज्यादातर दिल्ली में रहना पड़ा और इस बीच वे रेखाओं में ही जीवनानुभव को अभिव्यक्ति देते रहे, पंत अस्पताल में पड़े-पड़े चित्रों के माध्यम से रचनात्मकता के रंग उरेहते रहे | बाईपास सर्जरी और उसके बाद इंफेक्शन के कारण जगदीश जी थके तो अवश्य लग रहे थे, पर सर्जना की दीप्ति स्पष्ट रूप से उनकी आँखों में पढ़ी जा सकती थी, उनकी यह छवि देखकर मैं अपने भीतर सुगबुगा आये प्रश्न पूछने का लोभ संवरण नहीं कर सका, और बरबस बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया |
• डॉक्टर साहब | मैथिलीशरण गुप्त सम्मान की घोषणा सुन कर आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?
प्रश्न सुनते ही जगदीश जी के चेहरे पर एक सहज तोष की इबारत लिखने लिख उठी उन्होंने कहा—
“यह पुरस्कार सबसे पहले शमशेर बहादुर सिंह को मिला, उस आयोजन में मैं निमंत्रित था | फिर एक बार गुप्त जी के ही संदर्भ में आयोजन हुआ | उसमें भी मैं गया | कहीं न कहीं मेरे मन में यह भावना थी कि गुप्त जी के जन्म दिवस को कवि दिवस के रूप में माना जाय | प्रांतीय स्तर पर नहीं अखिल भारतीय स्तर पर | इस विचार से मैं यह मैं यह अनुभव करता हूं कि मेरी वह भावना अंशतः फलीभूत हुई है | मैं इसे मैथिलीशरण जी का ही आशीर्वाद मानता हूँ, क्योंकि राम भक्ति मेरे रचेकाव्यों में केन्द्रीय बिंदु रहा है, चाहे शम्बूक हो, जयन्त हो, शांता, जो अभी रचनाक्रम में है | यही संवेदना भूमि गुप्त जी की भी रही है | इसी तरह ‘गोपा गौतम’, यशोधरा की ही तरह अथवा उससे भिन्न दिशा में एक विनम्र प्रयत्न है और बोधि वृक्ष गौतम बुद्ध के प्रति मेरा प्रणाम’’
इस बीच दिल्ली प्रवास के दौरान मैंने अनेक चित्र बनाये, रेखाओं में ही अपने भीतर के रचनाकार को व्यक्त किया, कविता जैसे नेपथ्य में ही चली गई | इस संदर्भ में क्या मन की परते खोलेंगे | मेरी सहज जिज्ञासा देखकर जगदीश जी के चेहरे पर एक वत्सल मुस्कान तिर आयी, वे बोले—
हाँ ! हाँ ! क्यों नहीं | पिछले वर्ष में अधिकतर हृदय रोग के कारण मेरी मानसिक दशा ठीक नहीं थी जैसी सामान्यतया होती है | बाईपास सर्जरी और इंफेक्शन के कारण दिल्ली में रहना पड़ा | दिल्ली में अनुभव किया कि आत्मीयता का वह भाव जो रचना को संभव बनाता है, वह इलाहाबाद में ही सम्भव है, इसीलिए मुझे लगता है ‘यह सम्मान मेरा सम्मान नहीं इलाहाबाद का सम्मान है’, जिसने मेरे भीतर एक रचनाकार की आग दहकाये रखी | मैंने दिल्ली में प्रभूत चित्र बनाये, रेखाओं में जीवनानुभव व्यक्त किया, किन्तु यह विचित्र हुआ कि कविता अंतर्लीन हो गयी और रेखाएं जागृत हो उठीं, अब इलाहाबाद लौटा हूँ तो वाणी भी जागृत हो गयी है |’
• आपने एक लम्बी काव्य यात्रा संपन्न की है जब अपने पिछले पड़ावों की ओर दृष्टिपात करते हैं तो क्या किसी सार्थकता अथवा कृतार्थता का बोध होता है ?
प्रश्न सुनते ही जगदीश जी की स्मृति में उनकी अपनी मां पिरा उठीं छूटते ही उन्होंने कहा
“ कृतार्थता का बोध तो मुझे ‘माँ के लिए’ लिखने पर हुआ, उसको लिख कर मैंने अनुभव किया कि मैं अगर कुछ भी न लिखता केवल वही लिखता तो भी अपने लेखन को सार्थक मान लेता, क्योंकि उसमें एक पारिवारिक भाव भूमि है जो कविता में छूटती जा रही है | निराला ने सरोज स्मृति में पारिवारिकता की विसंगति को जैसे उजागर किया था, वैसा तो कोई दूसरा नहीं कर सका, पर मातृत्व की गरिमा और अंतर्जगत की संभावनाएं मुझे भी मां के जीवन की विसंगति में दिखीं इसलिए जैसे इस प्रसंग को मैं उजागर कर सका, वैसा रचनाकर्म कम हुआ है, यह भी इसलिए हो पाया क्योंकि मातृत्व की गरिमा और अंतर्जगत की संभावनाएं तो मुझे माँ के आंचल से ही मिलीं | जलमयी माँ गंगा में जिसके किनारे मैं लगभग आधी शती से रह रहा हूँ |”
“भागीरथी हम दोष भरे
पै भरोस यहै
हैं परोस तिहारे”
और रही जन्मदात्री माँ की बात तो मैं जैसे कह सका, उससे अधिक मेरे पास कहने को नहीं है | डॉ. रामकुमार वर्मा जो मेरे गुरु रहे वह भी उनका चरण स्पर्श करते थे |”
• बृजभाषा और नयी कविता शैली दोनों ही में आपने संवेदना के अनछुए छोर छुए हैं, दोनों की काव्य भाषा के बीच आप किस प्रकार सामंजस्य रख सके ? मैंने अगला प्रश्न किया | मैंने देखा जगदीश जी क्रमशः अतीत की सीढ़ियाँ उतर रहे हैं, लंबी सांस भर कर बोले—
“मुझे याद आता है माखनलाल जी का वात्सल्य, सनेही जी का दुलार | खड़ी बोली और बृजभाषा में काव्य रचना की प्रेरणा मुझे अपने परिवेश से मिलती रही | दोनों में किसी प्रकार का विरोध मैंने कभी देखा ही नहीं | एक धारा भारतेन्दु जी से चली, श्रीधर पाठक से होते हुए प्रसाद-महादेवी तक आयी | मैं अपने को उसी धारा में मानता हूं | बृज में सतत् लिखते जाने को मैं प्रतिबद्धता की मुद्रा में देखता रहा, इसकी प्रेरणा तो मुझे अपनी जन्मभूमि से ही मिली थी | डॉ. रत्नाकर, रसाल जी ने जिस धारा को संभव बनाया, उसमें खड़ी बोली काव्य के प्रति वितृष्णा थी, किन्तु मैंने ऐसा भी कभी अनुभव नहीं किया | छंदशती और उसकी भूमिका इसका प्रमाण हैं | नवीनता कविता का सहज गुण है, जो बृजभाषा में और आधुनिक कविता में नयी कविता के रूप में संभव हुआ | नये मनुष्य की प्रतिष्ठा जिस वैचारिकता से जुड़ी है, वह केवल नयी कविता के आंदोलन तक ही सीमित नहीं है, इसीलिए मेरा सम्मान हर नयी कविता का सम्मान है और साथ ही नयी दृष्टि का भी |”
• आपने चित्रात्मक कविता लिखी है और कवितात्मक चित्र बनाये हैं, क्या यह बतायेंगे कि आप अपने भीतर के कवि को स्वयं के अधिक निकट पाते हैं या चित्रकार को ? मेरी जिज्ञासा जगदीश जी को बहुत भली लगी, उन्होंने समाधान प्रस्तुत किया |
“चित्र कला सब कलाओं की आँख है | कविता में बिम्ब और लयात्मकता मुझे चित्रकला के संस्कारों से मिली | प्रागैतिहासिक भारतीय चित्रकला के व्यापक अनुशीलन में मैंने यह पाया कि चित्र शब्द से पहले संभव हुआ | रेखाएं अभिव्यक्ति का प्राथमिक माध्ययम बनीं| जब आदमी लिपि और भाषा से परिचित नहीं था तो भी अपनी अभिव्यक्ति के लिए चित्रांकन करता था | मैं यही मानता हूँ कि कविता चित्र की भावभूमि पर पल्लवित हुई | युग्म को मैंने चित्र काव्य कहा है | इसका आशय यही है कि मेरी रचनात्मकता में दोनों सहज भाव से अभिव्यक्त हुए हैं | रवि ठाकुर के चित्रों और काव्य में मानसिक अंतर दिखाई देता है | महादेवी जी के काव्य में चित्र पृष्ठभूमि में हैं और कविता प्रमुख है, किन्तु मैंने दोनों को समान भाव से ग्रहण किया है | कविता मेरे लिए उतनी ही सहज रही है जितनी चित्र-रचना, किन्तु जब वाणी सो जाती है तो चित्र ही मुझे अभिव्यक्ति का सहज माध्यम दिखाई देता है | रोग के कठिन दौर में मैंने इस सत्य को साक्षात्कार के रूप में देखा है |”
• काव्य रूप हो या चित्र, आँखें विशेष रूप से आपके रचनकार मन की संवेदना को झकझोरती रही हैं और इधर के बनाये चित्र तो विशेष रूप से अपनी अर्थछवियां देते हैं, एक मुखर संप्रेषणीयता के साथ उजागर होते हैं, अमूर्तन उनमें नहीं है, जो आपकी विशेषता या कमी भी रहा है | उनका भरपूर स्नेह पाकर इस सवाल के माध्यम से मैंने थोड़ी सी स्वतंत्रता ली | पर अमूर्तन के सवाल पर भी बड़ी सहजता से जगदीश जी ने कहा—
यह सही है कि बीमारी के दौर में मैंने जो चित्र बनाये हैं अमूर्तन की दिशा से भिन्न हैं किन्तु कल्पनात्मक अमूर्तन उनमें भी निहित है , जो प्रतीकों के माध्यम से ही व्यक्त किया जा सकता है, मेरे चित्रों में भी उसे देखा जा सकता है, उदाहरण के लिए देखिए बहुलोचना नदी—
“पुल से देखा
हर नाव नदी की आँख दिखी |
बहुलोचना नदी की
खोज में,
लिखी कविता
फिर भी रही
अनलिखी |
मैंने तो एक अन्य कविता में भी कहा है—
‘कवि वही जो अकथनीय कहे
किंतु सारी विषमता के बीच मौन रहे
कवि वही जो अकथनीय कहे |’
• सम्मान के इस अवसर-विशेष पर आप परिमल के दिनों के साथियों को स्मरण कर कैसा अनुभव करते हैं | मैंने फिर अतीत की खिड़कियां खोल दीं डॉक्टर साहब फिर उस अव्यय अतीत की गंध में डूब गये और बोले |
“इलाहाबाद पंत, निराला, महादेवी की रचनाभूमि रही है जब मैं यहाँ आया तो इनके आशीर्वाद की सघन छाया इलाहाबाद क्या, समूचे साहित्यिक जगत पर थी | यह साही, सर्वेश्वर, भारती जैसे दोस्त मिले | गोपेश जी को खासतौर पर धन्यवाद करता हूँ, यहाँ आने पर वह सबसे पहले मिले | केशव चन्द्र वर्मा, गंगा प्रसाद पांडेय, विपिन कुमार अग्रवाल, लक्ष्मीकांत वर्मा सभी के साथ सत्संग का सुख मिला | रघुवंश जी रामस्वरूप जी से भी यहीं भेंट हुई |
• साहित्य लेखन के संदर्भ में आप वाद और विधा की प्रतिबद्धता को आप किस रूप में देखते हैं ? आज की कविता में छंद की कविता कहाँ तक प्रासंगिक लगती है ? मैंने अंतिम प्रश्न किया डॉक्टर साहब ने बड़े दृढ़ स्वर में उत्तर दिया |
“ मैं साहित्य को वादमुक्त धरातल पर ही स्वीकार करता हूँ | वादग्रस्तता संकीर्णता का बोध कराती है और एक पूर्वाग्रह भी देती है | मुझे याद पड़ता है मैं बांदा गया था प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन वहाँ मैंने एहतराम इस्लाम का यह शेर पढ़ दिया—
नारों की नहूसत से कविता को
बचा रखें
कविता को अगर कोई हथियार
समझता है
शेर सुन कर तथाकथित प्रगतिशीलों के पैरों तले की जमीन खिसकती दिखाई दी | खैर और अन्य विधा का जहाँ तक सवाल है, उसमें मैं कविता मात्र को एक ‘मेजर हेड’ के रूप में देखता हूँ, छंदमुक्त कविता या छंद-कविता यह सब उपविधाएं हैं | मैं तो कविता में लय का पक्षधर रहा हूँ, जिसे कभी अर्थ की लय कहा था | छंद-कविता तो प्रासंगिक है ही , पर हर वह कविता जियेगी जिसमें लय है, लयहीनता कभी भी सार्थक कविता के पक्ष में नहीं जायेगी, बदलती हुई सामाजिक स्थितियों में भी कविता की लय नहीं खो सकती क्योंकि उसमें जीवन प्रतिबिम्बित है |”
जगदीश जी से इतनी देर बात कर मैं अपने आप को समृद्ध अनुभव कर रहा था, उनके चेहरे पर थकान की रेखाएं उग आयीं थीं, सो मैंने उन्हें प्रणाम निवेदित किया और विदा ली |
Ø अमृत प्रभात / साप्ताहिक परिशिष्ट / 5 जुलाई 1992
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यातना का अंकन भी कितनी बड़ी यातना है...
साक्षात्कारकर्ता : मज़ीद अहमद / संडे मेल / 15-21 मार्च 1992
· आपकी रेखाएं सरल लेकिन अत्यंत अभिव्यक्तिपूर्ण ढंग से कागज पर बिखर जाती हैं और उतनी सहज नहीं रह जातीं, बल्कि एक विचित्र कल्पना-लोक तैयार कर लेती हैं ?
रेखाओं में अर्थ की गहराई तक पहुंचना सबके बूते की बात नहीं है, एक आंतरिक संयोजन जो सूक्ष्म और संक्षिप्त होकर आकार ग्रहण करता है, कभी-कभी वह प्रत्याशित होता है और कभी अप्रत्याशित, लेकिन हर अवस्था में एक संयोजन ही उसमें निहित रहता है | आपने मेरी रेखाओं में बिखरने का अभास कैसे अनुभव किया ? क्योंकि बिखरना एक ऐसी क्रिया है जो मेरी रेखाओं के साथ कदाचित ही घटित होती हो |
आपने कवि-हृदय से मेरे रेखाचित्रों को देखाहै, इसमें कोई संदेह नहीं, बिखरने का एक अहसास अपने जीवन में मुझे हुआ है पर वह दूसरे स्तर पर, रेखाओं के स्तर पर नहीं, मेरी पंक्ति है— “मैन बिखर गया हूँ अपने ही चारों ओर” ऐसा लगता है कि मेरे इस भाव को आपने अपनी अंतर्दृष्टि से देख लिया |
· लगता है आप रेखाओं के जरिए आकृति नहीं, मनःस्थिति खींचते हैं, और इस तरह भाव धीरे-धीरे एक सम्पूर्ण विचार का रूप लेने लगता है |
आकृतियां कब, कहां प्रतीकात्मक हो जाती हैं, यह मैं रेखाकार के रूप में स्वयं देखने लगता हूँ, भाव और विचार के बीच रचना और रचनाअत्मकता अंतर्निहित रहाती है |
नयी कविता में यह समास्या बहुत बार उठी कि भाव और विचार का क्या सम्बंध है ? मैंने अपने ढंग से इसका उत्तर अपनी रेखाओं में दिया है |
· कभी-कभी तो लगता है आप फ्रायड या काफ्का के संसार में पहुंच गये हैं या यों कहें कि फ्रायड और काफ्का शब्दों के जरिये आजन्म ठीक उन्हीं मनःस्थितियों को कहने की कोशिश करते रहे जो अब आपकी रेखाओं में भी पूरी नहींकही जा सकीं...
आपने फ्रायड और काफ्का के माध्यम से मेरे विषय में जो कुछ कहना चाहा है, वह मुझे अंशतः स्वीकार है, मैं इन मनीषियों, रचनाकारों के कृतित्व से इतना परिचित नहीं कि कुछ सीधे कह सकूं, पर इस युग को उन्होंने कैसे प्रभावित किया है, इसकी प्रतीति मुझे अवश्य है | अंतर्मन की गहरायों में पैठकर तथा अभिव्यक्ति की जटिलताओं तक उतर कर जो अभिव्यक्ति सामने आती है, उसमें परंपरागत अभिव्यक्ति से भिन्न दिशा अपनायी जाती है, आपने पिकासो का नाम नहीं लिया, मेरी दृष्टि से अंतर्लीन आकृतियों के पुनर्संयोजन की शक्ति जितनी उसकी कला में मिलती है, वैसी अन्यत्र देखने में नहीं आती, उसका प्रभाव भी आधुनिक कला में देश-देशांतर तक व्याप्त है, मेरी गज़ल की प्रारम्भिक पंक्तियां, जिन पंक्तियों से समाप्त होती हैं, उनमें उसका स्मरण किया गया है—
‘टके पर सब कुछ टिका है
आदमी कितना बिका है.’
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हर मुसब्बिर है पिकासो,
हर रचाव गोएर्निका है.’
· इन रेखाचित्रों में रेखाओं के बीच का अखींचा संसार; खींचे गये संसार से कई गुना ज्यादा बोलने लगता है और दृष्ट से बाहर उठाकर अनंत अदृष्ट में दर्शक को फेंक देता है ?
ऐसा लगता है कि यह प्रश्न मेरे अन्यत्र अप्रकाशित चित्रों तक सीमित नहीं है वरन् ‘युग्म’, ‘आदिम एकांत’ आदि में प्रकाशित चित्रों तक की प्रतीति कराता है, रचनाकार क्या कहना चाहता है और क्या कह पाता है— इसका वह पूरी तरह साक्षी नहीं हो पाता, जो कुछ भी मैंने कहा, क्या वही था मन में, ठीक वही क्या कह पाया ? यह समस्या हर रचनाकार के आगे आती है | आपने ‘अखींचा’ शब्द से जो बात कही है, वह खींची हुई रेखाओं के पार जाने की कल्पना करती है, मैं नहीं जानता कि मेरी रेखाओं में रेखातीत कितना झलक पाया है पर इतना अवश्य कि यदि वैसा नहीं हुआ होता तो रेखाओं में मैंने अपने मन की अप्रत्याशित अभिव्यक्तियों का आनयन न किया होता, बहुत जगह मैं असफल भी रहा, पर हर असफलता-सफलता की छटपटाहट को व्यक्त करती है, जो मेरे मन में मेरी रचनाशीलता को सक्रिय बनाती है |
· कुछ मानवाकृति रेखाचित्रों में रेखाओं को पूरी तरह गिना जा सकता है और आकृति उभरने के बाद यह रेखाएं स्वयं एक अमूर्त लेकिन गहन भाव की सृष्टि करने लगती हैं, क्या आपने स्वयं ऐसा काभी महसूस किया है ?
मूर्त और अमूर्त का द्वंद्व आज की कला में जितना मुखर हुआ है, वैसा प्राचीन और मध्यकालीन कलाओं में दृष्टिगत नहीं होताअ | सगुण और निर्गुण शब्द तो मिलते हैं पर उनकी द्वंद्वात्मक स्थिति रचनाकार के रूप में अनुभव नहीं की गयी | इधर पाश्चात्य प्रभाव अमूर्तन को नयी अभिव्यक्ति का संवाहक बना दिया है और एक नया आयाम सामने आ गया है | मैं मूलतः अमूर्त कलाकार नहीं हूँ, क्योंकि मुझमें आकृतियाँ फलती—फूलती रही हैं और मेरी प्रेरणा भी उनसे जुड़कर प्रकट हुई है, किन्तु यह मैं जानता हूँ कि इंप्रोवाईजेशन (अपूर्व निर्धारित) की विधि से जो चित्र बनाये जाते हैं, उनमें असीम संभावनाएं निहित रहती हैं, बजाय उन चित्रों के जो पूर्व-कल्पित होते हैं | मैंने अपूर्व निर्धारित विधि से असंख्य चित्र बनाये और पाया कि मन की गहरायों को व्यक्त करने में यह विधि मूर्त चित्रों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली और सार्थक सिद्ध होती है |
· अधिकतर रेखाचित्रों में यातना अपने आप आकार लेती-सी लगती है, मेरा विचार है यातना को चित्रित करना अपने आपमें कोई कम छोटी यातना नहीं है...
‘यातना का अंकन भी कितनी बड़ी यातना है’—यह पंक्ति ‘युग्म’ के उत्तरार्ध की एक कविता में आयी है, प्रागैतिहासिक चित्रों में एक चित्र ‘सूकर’ का, जिसका मुँह खुला हुआ था और जिसकी पीठ पर एक आयुध गहरे पैठा हुआ था—हजारों वर्ष पूर्व जिस चित्रकार ने यह आकृति बनायी होगी उससे तादात्म्य अनुभव करते हुए यह बात मेरे मन में आयी और कविता का अंग बन गयी, पूरा आशय तो कविता पढ़ने पर ही प्रकट होता है तथापि यातना की गहराई का अनुमान उक्त संदर्भ से प्रकट हो जाता है |
· कहीं ऐसा तो नहीं कि आपकी रेखाएं किसी खौफनाक काल की सूचना दे रही हों ?
मैं जब भी कुछ रचने लगता हूँ तो भय, उसका एक ही पार्श्व दिखायी देता है, समय चित्र उसी तक सीमित नहीं होते, अनुभूतियों के अनेक रूप संश्लिष्ट रूप में रचना में प्रकट होते हैं, इसलिए किसी एक बिंदु पर उन्हें केंद्रित और पारिसीमित नहीं किया जा सकता |
· किसी-किसी रेखांकन को देखने के बाद एक खास किस्म की जीवनगत नाउम्मीदी बार-बार मुखरित होती-सी लगती है और अकेलेपन की अनुभूति जैसे चारों ओर छा जाती है ?
मैं वही कहूंगा कि ‘आदिम एकांत’ की अंतिम कविता मेरी रचनाओं में एक स्थायी भाव के रूप में आ जाती है, न जाने कितने रेखांकन इस आत्मलीन अवस्था को चित्रित करते हैं और उसके अनेक स्तर भी प्रकाट होते हैं | मुझे ऐसा लागता है कि रचनाकार अपाने भीतर की एकात्मकता को बहुधा इस रूप में प्रकट करता है पर जब उसमें गतिशीलता और आवेग पुनः सक्रिय हो उठता है तो स्थिति बदल जाती है, स्थायी और अंतरा का जो रूप संगीत में मिलता है, वैसा ही मेरे चित्रों में देखा जा सकता है |
· मान लीजिए आप अगर ये रेखाचित्र नहीं भी खींचते तो क्या यह कहा हुआ अनकहा रह जाता ? और अगर हाँ तो आप अभिव्यक्ति का कौन-सा विकल्प ढूंढते, जबकि आप स्वयं कवि हैं और शब्दों से परे आपने इन रेखाओं का सहारा लिया है ?
मैंने कवि-चित्रकार के सुदीर्घ, प्रायः जीवनव्यापी, जीवन में यही पाया है कि रेखाएं प्राथमिक हैं, शब्द उसके बाद अस्तित्व में आते हैं, प्रागैतिहासिक भारतीय चित्रकला के अनुशीलन और लेखन में यह प्रतीति मुझे और अधिक होने लगी कि मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति उन स्थितियों में भी करता रहा है जब भाषा का कोई प्रमाण नहीं मिलता | अपनी अभिव्यक्ति में वह अपूर्णता का भी अनुभव नहीं करता | जो चित्र उसने बनाये हैं, वे चित्र अनुभव की सम्पूर्णता के द्योतक हैं |इससे मुझे और बल मिला, कुछ अनुभव दूसरे तरह के भी हैं, जैसे, ‘स्मृति-भ्रंश’ के बाद जब डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था तब मेरी वाणी असंख्य रेखाचित्र बनाते-बनाते स्वयं प्रकट हो उठी और शब्द मेरे अधिकार में आने लगे, कविता फिर संभव हुई, पर उसके मूल में रेखाएं थीं | यह मेरा निजी अनुभव है, इसकी प्रामाणिकता के लिए मुझे किसी साक्षी की जरूरत नहीं है |
· इन आकृतियों का उद्भव कहीं न कहीं आपकी अनुभूतियों से निकली हुई लकीर है | वह कैसी है और क्यों है, यह तो आप ही बता सकते हैं ?
आकृतियों में प्रकट होने वाली लकीर का मैं फकीर हूँ | रेखा की शक्ति और आगे चलकर रेखाओं की शक्ति कहाँ, कितनी अभिभूत करने वाली होती है | यह मैं स्वयं नहीं कह सकता हूँ, किन्तु उसके अनुभव से गुजरने पर मैं रेखाओं को आकृतियों में बदलते देखकर एक लीलात्मक अनुभव तक पहुँच जाता हूँ | मैं रेखाएं बनाता हूँ या रेखाएं मुझे बनाती हैं, जो कुछ बनकर सामने आता है, वही महत्वपूर्ण है |
· चित्रकला सब कलाओं की आँख है—इससे आपका क्या प्रयोजन है ? क्या कविता इस मामले में कमतर पड़ती है ?
प्राचीन आचार्यों ने स्पष्ट लिखा है—‘रेखां संशंत्याचार्याः वर्तनामं च विचक्षणः’ स्त्रियोः भूषणमिच्छंति वरणाढ्य मितरेजनाः’ यहाँ रेखाओं की स्थिति सर्वोपरि मानी गयी है | मैं भी इसी विचार का हूँ | समस्त पौर्वात्य कला, चाहे वह चीन की हो, तिब्बत की हो, लंका की हो अथवा इंडोनेशिया की, रेखाप्रधान रही है |भारतवर्ष की कला भी पूर्णतः इसी पंथ की अनुगामिनी रही है | अजन्ता और बाघ (मध्यप्रदेश) से लेकर प्राचीन राजस्थानी तक रेखा प्रदान चित्रण मिलता है | दक्षिण में भी यही परम्परा दृष्टिगोचर होती है, मैंने अपने कलागुरु क्षितिंद्रनाथ मजुमदार से यही संस्कार पाया है कि रेखा का स्थान सर्वोपरि है | पाश्चात्य कला ने अवश्य रंगमयता को नये आयाम दिये हैं, पर मेरे विचार से रेखा आज भी अपना अद्वितीय स्थान रखती है, तो चित्रकला सब कलाओं की आँख है, इस तक पहुँचने के लिए मुझे निजी अनुभव का सहारा लेना पड़ा | मेरी कविताओं में आँख की अभिव्यक्ति विशेष रूप से हुई है—
‘पुल से देखा
हर नाव नदी की आँख दिखी,
अथवा
‘आँख भर देखा कहाँ, आँख भर आयी |’
ऐसी न जाने कितनी पंक्तियां हैं और न जाने कितनी कविताएं | आँख से देखा हुआ अनुभव—जगत हर इंद्रिय से अधिक विशद और सूक्ष्म होता है—‘गिरा अनयन नयन बिनु मानी’ अथवा— ‘जुबां के आँख नहीं, आँख के जुबां नहीं.’ यह द्वंद्व साहित्य और कलाओं में चलता रहा है, भव्य-कलाओं में संगीत और काव्य है, शेष सब कलाएं दृश्य कलाएं हैं | बिंब–विधान के माध्यम से मैंने कविता में भी दृश्य-तत्व नयी कविता के क्रम में रेखांकित किया और प्रतीक के साथ बिंब भी महत्वपूर्ण हो गया | संगीतज्ञ भी ध्यान करते हुए राग की आभिव्यक्ति करते हैं | अतः मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं कि चित्रकला सब कलाओं की आँख है |
· कला अपने काल से अनुबंधित होती है और जहाँ तक यह एक खास ऐतिहासिक स्थिति के विचारों और आकांक्षाओं से, आवश्यकताओं और आशाओं से मेल खाती है, मानवता का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन इसके साथ कला इस सीमा के पार भी जाती है...
कला और काल विषय-चिंतन बहुत समय से होता रहा है | शिव को कलाश्लाध्यसूल ने—यह कथन उन शिव के लिए कहा गया है जो निरुपादान बिना भिति के चित्र-रचना में सक्षम होतेहैं | जब कला ऐसे संस्कारों से उत्पन्न होती है, तो वह केवल समय सीमातक बंधी नहीं रह पाती बल्कि कालातीत और काल पर होने की शक्ति रखती है, इसे युगातीत और युगेन कला के रूप में पहचाना जाता है | जहाँ तक कलाकार का प्रश्न है वह अपने युग से प्रेरणा ग्रहण करता है और अपने युग में सार्थकता ग्रहण करने में उसकी सार्थकता प्रकट होती है, पर ऐसे भी कलाकार, साहित्यकार हैं जो निःसंकोच यह कह देते—
‘कालोह्मं निरवधिर्विअपुला च पृथिवी’ |
—संडे मेल / 15-21 मार्च 1992
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रेखाओं के कुशल शिल्पी : डॉ.जगदीश गुप्त
—जयनाथ मणि त्रिपाठी
‘अंचल भारती’ का कथा अंक प्रेस में था इसी बीच कार्यालय के काम से इलाहाबाद जाने का अवसर मिला, कई दिन रूकना था | इसी प्रवास क्रम में एक दिन डॉ.जगदीश गुप्त से मिलने का कार्यक्रम भी बन गया, और मैं उनके नागवासुकि (दारागंज) स्थित निवास पर जा धमका, संयोग अच्छा था डॉ.गुप्त घर पर ही थे— खाली और एकदम ‘फ्रेश’, औपचारिक परिचय के बाद घंटों इधर-उधर की बातें होती रहीं, मैंने ‘अंचल भारती’ के लिये ढेर सारे उनके ‘रेखांकन’ छाँटे और कुछ तुरंत ही तैयार भी करवाया, चाय-पान के बाद वे पार्श्व भाग में अवस्थित अपने ‘कलाकक्ष’ में ले गये जहाँ विभिन्न कलाकृतियाँ, पोर्ट्रेट,कैनेवास, स्टैंड,तूलिकायें रंग और स्केचपेन आदि इधर-उधर किंतु करीने से धरे थे, चित्रात्मकता, लय एवं सोच की सुलझी पकड़ के जादूगर डॉ.जगदीश गुप्त का ‘कलाकार’ हर पल, हर बिंदु पर सजग था मुखर था, फर्श और दीवाल पर अटे-बंटे उकेरे चित्रों ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया था ,समय कम था और ढेरों प्रश्न उमड़- घुमड़ रहे थे, मैंने सीधे-सीधे कुछ प्रश्न कर डाले और उन्होंने जो उत्तर दिया उसे मैं नीचे वैसे ही उद्धृत कर रहा हूँ |
प्रश्न :- डॉ. साहब ! आप नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में ख्यात हैं और आपका कविता संग्रह ‘नाव के पाँव’ अपने में बेजोड़ है, आप हिंदी विभाग से सम्बद्ध भी हैं, क्या आप बताने का कष्ट करेंगे कि आप की चित्रकला में रुचि कब और कैसे हुई ?
उत्तर :- आपने ठीक ही कहा कि मैं मूलतः हिंदी का व्यक्ति हूँ लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि हिंदी का व्यक्ति या कवि चित्रकला का व्यक्ति या विद्यार्थी नहीं हो सकता,बल्कि वास्तविकता तो यह है कि कवि के साथ कलाकार, मेरा तात्पर्य चित्रकार से है, युग सत्य को अधिक सक्षम रीति से उद्घाटित कर सकता है जो अधिक सशक्त, सहज और प्रेरक होगा, मैंने एक ओर जहाँ कविताएँ लिखीं हैं जो लोगों की रुची और उनके द्वारा सराही गई है, वहीं मेरे चित्रों को भी लोगों से प्यार-दुलार और समर्थन मिला है, आपने देखा होगा महादेवी जी के गीत उनके चित्रों के साथ कितने सजीव प्रेरक एवं सशक्त हो जाते हैं ?
जहाँ तक मेरे रुचि या सुझाव का प्रश्न है काल सम्बंधी कोई निश्चित रेखा नहीं खींची जा सकती, बल्कि यूं समझ लीजिये कि यह सब बीज रूप में विद्यमान होती हैं जो अवसर पाकर अंकुरित और प्रस्फुटित हो जाती हैं |
प्रश्न :- आपके कविताओं में एक आग्रह सा एक कसक सी महसूस होती है, किन्हीं हद तक आपके चित्र इसके अपवाद हैं, आप इस सम्बंध में क्या कहना चाहेंगे ?
उत्तर :- यह तो अपनी-अपनी सोच समझ है, जहाँ तक कविता और चित्रों में आग्रह और कसक के अभिव्यक्ति का प्रश्न है मैं इसे मात्र माध्यम का भेद मानता हूँ, चित्रों की मूकभाषा के लिये आप अपने शब्द देने के लिये स्वतंत्र हैं किंतु कविता में आपको वह स्वतंत्रता कहाँ ?
प्रश्न :-डॉ. साहब, आप कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्बद्ध रहे हैं, कई साहित्यिक पत्रिकाओं का सफल सम्पादन भी किया है, इसी तरह कला सम्बंधी अपने कार्यों पर भी थोड़ा प्रकाश डालने का कष्ट करें जिनसे आप सम्बद्ध हों ?
उत्तर :- ‘नाव के पाँव’ के अतिरिक्त ‘शब्द दंश’ ‘हिमविद्ध’ आदि संकलनों के अतिरिक्त नईकविता के एक से लेकर आठ अंक तक का सम्पादन मैंने किया है , परिमल के संयोजक के रूप में भी मैं कार्य कर चुका हूँ वहीं भारतीय चित्रकला जो नेशनल पब्लिशिंग हाउस दिल्ली से प्रकशित-ग्रंथ का प्रणयन कर मुझे काफी संतोष है, राज्य ललित कला अकादमी से भी मैं सम्बद्ध हूँ तथा अकादमी द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका के सम्पादक मंडल में हूँ |
प्रश्न :- अच्छा आप यह बतला दें कि रेखांकनों के लिये किस प्रकार की भाव-भूमि आपको अधिक प्रेरित करती है और क्यों ?
उत्तर :- देखिये कला को लोकजीवन से अलग कर देखने से उसकी जीवंतता समाप्त हो जायेगी, लोक जीवन और रोजमर्रे के दृश्यों का रेखांकन अधिक प्रकाशोत्पादक एवं लोगों को आत्मीय लगते हैं,मेले का दृश्य, किताब बेचने वाला, ट्रेन में सोयी हुई महिला, बस में यात्रा के समय के दृश्य आदि की गति साधकर किये गये रेखांकन जहाँ लोगों को आत्मीय से प्रतीत होते हैं, वहीं इनसे मुझे अपार सुख मिलता है, इस प्रकार के प्रेरक दृश्यों को देखकर मेरी अंगुलियाँ अपने आप थिरकने लगती हैं, इन्हें रोका नहीं जा सकता, मैं इन्हें रोकता भी नहीं हूँ—
प्रश्न :- अंत में यह जानना चाहूँगा कि आप मूलतः कहाँ के निवासी है और प्रयाग वासी कब से हुये ? क्या आप नये कलाकारों के लिये कोई प्रेरक संदेश देना चाहेंगे |
उत्तर :- भाई ! वैसे तो मैं शाहाबाद( हरदोई का मूल निवासी हूँ किंतु शिक्षा-दीक्षा के क्रम में देहरादून, सीतापुर, मुरादाबाद, कानपुर और इलाहाबाद में रहते हुए सन् 1950 से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से सम्बद्ध हूँ प्राचीन मूर्तियों, मुद्राओं को देखने संग्रह करने के अतिरिक्त मुझे भ्रमण से (मुख्यतः गिरी गह्वरों के) सुख मिलता है | मेरा विचार है कि अपने देश के शिलाचित्रों के विपुल वैभव से सही गम्भीर रूप से परिचित होने पर भारतीय कला को मौलिक दिशा में प्रवृत्त होने की सम्यकप्रेरणा मिलेगी |
इस बीच कु. कल्पना शर्मा से परिचय कराते हुए डॉ.गुप्त ने उनके सद्यः प्रकाशित मनोरमा के निबंध को मेरी ओर सरका दिया, कु. शर्मा ने डॉ. गुप्त को देर से प्रतीक्षारत कुछ मेहमानों की ओर इंगित किया और हम सभी के हाथ बर बस जुड़ गये |
(अंचल भारती-साहित्यिक त्रैमासिकी- कला अंक-8 :वर्ष-1981,लेखक; जयनाथ मणि त्रिपाठी— 2/451 देवरिया रामनाथ, देवरिया )
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लिखना स्वाभविक कर्म है... डॉ. जगदीश गुप्त
भेंट कर्ता : अमरदीप संवाददाता सुभाष सिंह राठौर
मध्य प्रदेश सरकार ने प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर के कवि को उसकी अद्यतन सेवाओं के लिए दिया जाने वाला मैथलीशरण गुप्त सम्मान इस बार डॉ. जगदीश गुप्त को देने का निर्णय किया है | पांचवे दशक में ही नयी कविता ‘आन्दोलन’ के माध्यम से अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लेने वाले डॉ. गुप्त उन कवियों में रहे हैं, जो नयी कविता आन्दोलन को कभी समाप्त प्राय नहीं मानते | क्योंकि वह आन्दोलन और काव्यधारा को अलग-अलग रूप में रखकर चलते हैं | विपरीत परिस्थितियों में भी काभी निष्क्रिय न होने वाले डॉ. गुप्त हृदय की ‘बाई पास सर्जरी’ के बाद पूरी तरह स्वस्थ न होते हुए भी सहज एवं सक्रिय हैं | सामान्य कार्यों एवं सहज रूप से पुरस्कार मिलने के बाद शुभचिन्तकों से घिरे उन्होंने व्यक्तिगत और साहित्यिक सन्दर्भ में ढेर सारी बातें कहीं | प्रस्तुत है अमरदीप संवाददाता सुभाष सिंह राठौर से उनकी हुई बातचीत का कुछ अंश —
प्रश्न: डॉ. साहब ! आपने कई विधाओं प्रमुख रूप से कविता और चित्रकला में महत्वपूर्ण कार्य किया है | इसमें से आपको कौन-सी विधा अधिक प्रिय है ?
उत्तर : देखिए, काव्य शब्दगत कला है जबकि चित्रकला रूपगत है | ये दोनों एक ही स्रोत से निकलने के कारण आन्योन्याश्रित होती है | किसी स्थिति में यह (कविता) प्रमुख होती है तो किसी स्थिति में वह (चित्रकला) | कविता लिखने बैठता हूं तो कहीं-न-कहीं उसमें चित्रात्मकता होती है और चित्र बनाते समय उसका भी उसका काव्यगत पक्ष मस्तिष्क में होता है | परन्तु यह दोनों विधाएं स्वतंत्र हैं और एक दूसरे का आधार नहीं बनती |
प्रश्न : आपके आरम्भिक जीवन और शिक्षा के बाअरे में ‘अमरदीप’ के पाठक जानना चाहेंगे, कृपया इस संदर्भ में कुछ बतायें ?
उत्तर : मेरी छठी तक की शिक्षा जन्मस्थान शाहाबाद में हुई | सातवीं कक्षा में देहरदून में था उसी समय घर पर पिता जी का स्वर्गवास हो गया | आठवीं कक्षा में सीतापुर फिर मौसा जी के साथ मुरादाबाद और फिर बहनोई के साथ रहकर कानपुर से मैंने इंटरमीडियेट किया | इंटरमीडियेट में उत्तरप्रदेश में मेरा तृतीय स्थान और गणित में 95 प्रतिशत अंक थे | इसके आगे की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई | इन विभिन्न स्थानों के वातावरण का प्रभाव मुझ पर बहुत अधिक पड़ा | इन बीच में विभिन्न साहित्यिक प्रवृत्ति के लोगों के साथ रहने का अवसर मिला, जिसका मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा | मुझमें विविधता भी इसी कारण आई |
वस्तुतः जीवन के बारे में खंड-दृष्टि गलत परिणामों की ओर ले जाती है | टुकड़ों टुकड़ों में परिणाम भिन्न लगेंगे | बिखरी हुई चीजों के बीच में भी सारी चीजें समन्वित हैं | बिखराव बहुविधि व्यक्तित्व का प्रतीक है | निर्जीवता के बिखराव में ‘यूनिटी’ नहीं होती | जिसमें स्वछंदता नहीं है वह रचनाकार नहीं है | स्वच्छन्दता विश्रंखलता का प्रतीक नहीं है |
प्रश्न : आप को कविता लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली ?
उत्तर : मेरी शिक्षादीक्षा विभिन्न परिस्थितियों और स्थानों में हुई जहाँ कई साहित्यिक प्रवृत्ति के लोगों के साथ रहने का सुयोग मिला जिनसे मुझे बहुत अधिक सीख मिली |
मेरी कविता वातावरण की देन है | राममंदिर में अंताक्षरी होती थी | वहां कवित्त, सवैया, गीत इत्यादि लिखने वाले बहुत सारे लोग आते थे | तुलसी जयन्ती के अवसर पर वहां एक कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ | मैंने पहली कविता उसी समय लिखी थी जो पांच चरण का तुलसीदास पर लिखा गया कवित्त था | उस समय मैं यह नहीं जानता था कि कवित्त में कितने चरण होते हैं | हम कुछ रचें यह हमारा संकल्प होता है |
उन दिनों मेरी माता जी “नैमिषारण्य’ में अपने दीक्षा-गुरु स्वामी नारदानंद जी के आश्रम पर रहा करती थीं | मैं वहां हमेशा आता जाता रहता था और कभी रेल यात्रा में और कभी गोमती के तट पर घूमते-फिरते काव्य रचना करता रहता था | आप जानते हैं रेखा चित्रों के संदर्भ मे मेरी यह प्रवृत्ति अभी भी कायम है | नैमिषारण्य की रेतीली जमीन और खुले आकाश ने बहुत कुछ लिखने के लिए प्रेरित किया | “मेटि कै चंद समेटि कै तारक, जाने कहां चलि जाति विभावरी” जैसे कई छन्द वहीं लिखे गये थे |
प्रश्न : प्रारम्भिक अवस्था में अपने आस-पास के साहित्यिक वातावरण का उल्लेख करें जिनसे आप जुड़े और प्रभावित हुए ?
उत्तर : सीतापुर के साहित्यिक वातावरणकी छाया मेरे ऊपर आठवीं कक्षा से ही पड़ने लगी थी, जब मैं वहां राष्ट्रीय महाजनी पाठशाला का विद्यार्थी था | डॉक्टर रामनवल मिश्र आदि समीक्षकों तथा अनूप शर्मा, वंशीधर शुक्ल और कृपाण जी आदि कवियों से मेरा सम्पर्क तभी हो गया था | 1941 से 43 तक कानपुर के वातावरण का भी मेरे ऊपर प्रभाव पड़ा |
साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के संस्कार मुझे पंडित सद्गुरु शरण अवस्थी की सजग एवं ओजस्वी वाणी से मिले और काव्य रचना में सनेही जी तथा माखनलाल चतुर्वेदी जी की वात्सल्यपूर्ण वरद छाया ने मुझे विशेष प्रभावित किया | इलाहाबाद पहुंचने पर भी मुझे यही वातावरण मिला| गजेन्द्रनाथ चतुर्वेदी “ईश” आदि कुछ अन्य मित्र ब्रजभाषा में रचनाएं किया करते थे | एक बार प्रतिभा परीक्षण के लिए रसाल जी ने हमलोगों के सामाने एक समस्या रखी और उस पर मैंने जो छंद रचा वह सर्वोत्कृष्ट मानकर पुरस्कृत किया गया |
प्रयाग में ही परिमल का दौर प्रारम्भ हुआ |मैं पहले प्रारम्भिक सदस्य बना और फिर मुझे संयोजक बनाया गया | परिमल तरुण साहित्यकारों की संस्था थी जो साहित्यकारों की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गयी | आप जानते हैं कि संस्था में फिर हर वय के लोग किसी न किसी संदर्भ में शामिल हुए |
परिमल ने साहित्य में दलगत भावनाओं के विपरीत नये सौंदर्यात्मक तत्वों को रेखांकित करते हुए जिस साहित्यिक मूल्यबोध का विकास किया वह एक ओर प्रगतिशीलों पर भारी पड़ा तो दूसरी ओर संकीर्ण परम्परावादियों के लिए संकट बना | लिखना स्वाभाविक कर्म है |
मैं अन्तः प्रेरणा को विशेष महत्व देता हूँ | इसमें कुछ पूर्व संस्कार का भी महत्व होता है, जो मनुष्य को रचना कर्म की ओर प्रवृत्त करते हैं | कविता और चित्रकला में मेरी स्वतः प्रवृत्ति है |
प्रश्न: आप ने अन्तःप्रेरणा और पूर्व संस्कार की चर्चा की | कृपया इन्हें अपने संदर्भ में स्पष्ट करें ?
उत्तर : मैंने ‘शम्बूक’ की भूमिका में इसकी चर्चा की है | मैं इताना अधिक आध्यात्मवादी नहीं हूँ कि भौतिक धरातल पर होने वाले सारे अनाचारों-अत्याचारों को हरि लीला मात्र मानकर आनंदित हो जाऊं | और इतना भौतिकवादी भी नहीं हूं कि आत्मा की सत्ता को नकार दूं | कर्मशील मनुष्य के मूलभूत सामाजिक दायित्व को समझकर एक संतुलित मध्यमार्ग खोजने की चेष्टा मेरा मन निरन्तर करता रहता है |
प्रश्न : साहित्य में भी विभिन्न मार्ग अपनाये गये | विभिन्न खेमों में साहित्य रचना की जा रही है और इनसे साहित्य बहुत हद तक प्रभावित भी हुआ | क्या ये खेमेबाजी साहित्य का अहित नहीं कर रही है ?
उत्तर :साहित्य का हित अहित उस संवाद में निहित है | जो रचनाकार और पाठक के बीच स्थापित होता है, बाकी लोगों की कोई बात नहीं है | यदि इसका एक भी अच्छा श्रोता या पाठक है, तो ठीक है संख्या का कोई महत्व नहीं है | महत्व ‘क्वालिटी’ का होता है “क्वानण्टिती’ काअ नहीं | गुटबाजी से हम भयभीत नहीं हैं | साहित्य के लिए ग्रहणशीलता ही मुख्य है |
विमुख व्यक्ति को सम्मुख बनाना साहित्य का मुख्य कार्य नहीं है | मन बहलाना विलास की श्रेणी में आता है | साहित्य विकल्प नहीं सोचता | रचना का विकल्प नहीं होता | रचना अपने आप में संकल्प है | वह आदमी विलासी है जो वस्तु के अन्तर्गतता से नहीं जुड़ता | मैं साहित्य में मानसिकता को अधिक महत्व देता हूँ | राजनीतिक कविता का महत्व होता है किन्तु स्थायी नहीं | गांधी और मार्क्स के मानव तत्व से जुड़ने में खतरा नहीं है | कविता की शक्ति उसकी गहरी अन्तर्दृष्टि में है |
प्रश्न : जिन मानव तत्व की बात अभी आपने की, साहित्य के सभी तथाकथित खेमें इसे ही आधार मानते हैं | इन खेमों को मानववादी विचारधारा से जोड़कर कहाँ तक देखा जा सकता है ?
उत्तर : मानव हित चेतना को यथाशक्ति बंधन मुख्त करके विज्ञान की वस्तु परक उपलब्धियों से सम्बद्ध करके सामाजिक स्तर पर प्रस्तुत करना आज का प्रमुख ध्येय है | मनुष्य मनुष्य के बीच जन्मजात आर्थिक और सामाजिक अधिकार-साम्य की भावना साम्यवाद तक ले जाती है तथा मानव सम्बंधों के बीच एक दूसरे के स्वाभाविक एवं स्वातंत्रय की रक्षा का भाव मौलिक समानाधिकार के साथ मिलकर प्रजातंत्र तक पहुँच जाता है |
दोनों के मूल में गहरी मानववादी चेतना है परन्तु मनुष्य स्वयं क्या है इसकी तात्विक धारणा छोटी होने के कारण व्यावहारिक रूप दूषित हो गये हैं | मनुष्य के सुख की धारणा विभिन्न संस्कृतियों में अलग-अलग मिलती है | भारतीय सांस्कृतिक चिन्तन के अनुसार विचारों के स्वातंत्र्य और धर्म के स्वच्छंदता के अभाव में भौतिक समृद्धि निरर्थक हो जाती है |
मैं ऐसे देश में रहना पसन्द नहीं करुंगा जहां मुझे मेरी इच्छा के विरुद्ध किसी विशेष विचारधारा को मानने के लिए बाध्य किया जाय और न चाहूंगा कि भारत कभी ऐसा देश बने | इसी तरह सारा स्वातंत्र्य होने के बाद पूजा को ही सबसे बड़ा देवता मान लेने पर जो विकृतियां मानव आचरण और समाज के नैतिक स्तर में आती हैं | वे भी कम भयावह नहीं होती “न मनुषात श्रेष्ठतरम् हि किंचित” मेरी दृष्टि में अपूर्ण रहता है यदि उसके साथ यह न जोड़ा जाय कि “ न वित्तेन तर्पण्यों मनुष्य: |” इन दोनों को मिलाकर जो मानवावादी धारणा बनती है, मैं उसे ग्राह्य समझता हूँ | मनुष्य के विषय में भारत की ऐसी धारणा अत्यन्त प्रौढ़ है और युगों के ठोस अनुभवों से बनी है, इसीलिए समन्वय भाव से नहीं, आत्माभिव्यक्ति के मान से भारत के लिए आवश्यक है कि वह अपनी कल्पना के अनुरूप समाज रचना के लिए कृत संकल्प हो |
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डॉ. जगदीश गुप्त का प्रमोद सिनहा द्वारा गोविन्द वल्लभ पंत अस्पताल में लिया गया साक्षात्कार |
( डॉ. जगदीश गुप्त हृदयरोग से पीड़ित गोविंदवल्लभ पंत अस्पताल में भर्ती थे | उनकी शल्य चिकित्सा होने को थी | उन्हें तकलीफ थी पर उन्होंने कृपा पूर्वक साक्षात्कार का समय दिया | प्रस्तुत है डॉक्टर जगदीश गुप्त से डॉ. प्रमोद सिनहा की बातचीत |)
प्रमोद सिनहा— आज विपरीत परिस्थितियों में भी इतने एकाग्र भाव से कैसे काम कर लेते हैं ?
जगदीश गुप्त— यह प्रश्न तो बहुधा मैं स्वयं अपने आप से पूछता हूँ | लेकिन सहज लर्म और कला संस्कार हमारे लिए ऐसे हैं जैसे श्वास के साथ हमारा जीवन | तो उसमें अनुकूल या प्रतिकूल का सवाल उठता नहीं है | चित्र बनाता हूँ तो मुझे लगता है कि यही सही काम कर रहा हूँ | बीमार हूँ यह सही काम नहीं है | विसंगतियां हैं, यह सही काम नहीं है | चित्र बनाता हूं, यह सही काम है | कभी-कभी विकृत हो जाए, जैसा बनाना चाहता हूँ नहीं हुआ तो मुझे कष्ट होता है |
प्रमोद सिनहा— बीमार होने की तरह ही कष्ट होता है ?
जगदीश गुप्त— (हंसी)
प्रमोद सिनहा— आप अध्यापक भी हैं | आपने नयी कविता आंदोलन को गति दी | मूल रूप से आपने पुरातत्व और चित्रकला का भी झंडा उठाया हिन्दुस्तानी अकादमी के सचिव कोषाध्यक्ष और अध्यक्ष के रूप में जुड़े रहे हैं | कई संस्थाओं से सम्बंधित रहे विशेषकर परिमल से | तो कुछ लोग ऐसे होते हैं जो एक खास क्षेत्र अपने लिए चुन लेते हैं | आप एक सीमित समय में ही इतने सारे काम कैसे कर पाते हैं जबकि उनका एक दूसरे से कोई सम्बंध नहीं है | अम्बिति नहीं है |
जगदीश गुप्त— अपके सोचने का ढंग ठीक नहीं है |
अम्बिति किसे कहते हैं ?
जीवन इतना विशाल है कि उसमें अम्बिति हीनता नहीं है | एक दृष्टि चाहिए और जो आदमी तत्वदृष्टि रखता है वह तत्व दृष्टि के साथ जीवन दृष्टि भी रखता है | तो उसको कभी ऐसा लगाता ही नहीं कि अंबिति हीनता है | मैं लय तत्व पर विश्वास करता हूँ | लय, गति और यति तो जब तक जीवन में है तब तक जीवन है, लय है | जब यह नहीं है तो संगीत ही नष्ट हो गया | संगीत नष्ट हो गया तो फिर बचा क्या ? मेरा यह कहना है | यह नहीं कि मैंने यह सिद्ध कर दिया है कि ऐसा है |
प्रमोद सिनहा— वही तो मैं पूछ रहा हूँ |
जगदीश गुप्त— (वह कुछ सोचने लगे) उसका कारण है गंगा किनारे चालीस साल तक रहना | निरंतर चित्रकला के साथ जुड़ना ......
निराला, पंत, महादेवी, रामकुमार वर्मा से जुड़ना....कविता से जुड़ना | मुझे तो इन सबसे मिला....
(फिर कुछ सोच कर उन्होंने कहा )
नाला पाबंदे नय नहीं है—
फरियाद की कोई लय नहीं है |
सोचिए तो गालिब का शेर याद करके फिराक़ साहब ने कितनी बड़ी बात कही है | इतना बड़ा शेर उन्होंने कभी नहीं कहा | और मैंने जो इसे याद रक्खा (इस परिस्थिति में भी उन्होंने अपनी ओर देखा) तो मैं कहता हूँ यह असाधारण है | वह कह रहा है कि जो आप सब संगीत की बात कर रहे हैं | ये शाश्वत जीवन की बात कर रहे हैं |
प्रमोद सिनहा— ये जो चालीस साल आपने गंगाके किनारे रहने की बात कही तो उससे आपके सोच पर क्या असर पड़ा |
जगदीश गुप्त— ये मैं आप को बता भी सकता हूँ, नहीं भी बता सकता |
बता सकता हूँ इसलिए कि जीवन केवल वही नहीं है जो दिखायी देता है | ज्योतिष के भीतर हमारा अंतरिक्ष प्रगट होता है सूर्य... चंद्र...| इससे हमारा मन बनता है | मन अकस्मात नहीं बन जाता | बहुत से लोग ये जानते ही नहीं कि ऐसा है ? कविता कैसे उत्पन्न होती है |
सोचता रहता हूँ कि मेरा जीवन कहाँ से उत्पन्न हुआ ? भृगु-संहिता से हमारा सम्बंध हुआ तो उस समय मैं यह कह सकता हूँ कि मेरे जीवन के तीन-चौथाई अनुक्रम मुझे मालूम हैं | मैं चित्र बनाऊंगा, कविता लिखूंगा, पुरातत्व से जुडूंगा, गंगा के किनारे रहूंगा | आदि-आदि | और क्या-क्या मैं रचूँगा ? राम-काव्य रचूंगा | नयी कविता लिखूंगा | ये सब चीजें मुझे मालूम हैं | सन 1947 तक से मुझे मालूम हैं | बाद में जो घटित हुआ उसमें 95% से लेकर 50% तक वही आया |
वह एक दूसरा क्षेत्र है, इसलिए मैंने नहीं बताया | वहाँ कहना ठीक नहीं है |
.......यह मेरा विशुद्ध............. तत्व है | जानते हैं | भृगु-संहिता का नाम भृगु और शुक्र सम्वाद का अर्थ है काव्य | भृगु-स6हिता काव्य-संहिता है | उन्होंने जो मुझे काव्य कहा इसलिए मैं काव्य हूँ | और चित्र भी काव्य से बना है | आगे सब मैं बताऊंगा | लेकिन यहाँ अंधविश्वास से गर्हित लोग हैं या ऐसे लोग हैं जो विश्वास नहीं करते हैं |
प्रमोद सिनहा— आप ठीक कहते हैं |
जगदीश गुप्त— मेरे जीवन के चौदह वर्ष भारतीय प्रागैतिहसिक चित्रकला में लगे | मैं आनंदित अवस्था में होता हूँ तो चित्रकला आती है | मैं विकृत स्थिति में हूँ तो भी वही आती है | इसलिए मेरे लिए यह सहज आयाम है | मैं स्वयं अपने से प्रश्न करता हूँ कि आखिर ऐसा क्यों है कि कविता और चित्रकला इतनी अभिन्नता क्यों रखती हैं | इसका उत्तर मेरे पास नहीं है | कुंडली इसका उत्तर है कि मेरे जन्म-काल में ये स्थिति थी | जब तक ये स्थिति रहेगी तब तक मैं कविता और चित्रकला से अभिन्न बना रहूंगा |
प्रमोद सिनहा— चित्रों की लयात्मक भूमिका में गंगा का हाथ रहा है ?
जगदीश गुप्त— बहोत ऽऽऽ | ......
मध्यकाल के चित्र देखिए | मुझसे आगे के चित्र देखिए | हाँ, जहाँ आधुनिक चित्र हैं वहाँ भी विसंगतियाँ संगतियों की खोज करती हैं | यही नहीं, सोचिए जरा कि कोई कविता मेरी ऐसी नहीं है कि जो गंगा के किनारे से अलग लिखी गयी हो | एक बात.... हिमविद्ध सबसे बड़ी कविता है जो हिमालय पर लिखी गयी है | तो भी लय है | जहाँ से चलती है वहीं पहुंचती है | गंगा से चलती है,गंगा तक पहुँचती है |
कुम्भ-दर्शन एक छोटी सी बुकलेट मैंने लिखी है उसमें मैंने जीवन क्रम को रक्खा है | दूसरा यह कीजिए कि “माँ के लिए” मैंने जो लिखा है उसमें कुम्भ भी है, कुम्भ-दर्शन भी है माँ के लिए रचना भी है |
मुझे जानना है तो “माँ के लिए” जानिये |
प्रमोद सिनहा— जैसे कि बात दोस्तों से चलती रहती है | एक बार मेरे एक मित्र ने पूछ कि मैं जगदीश जी मैं कौन सी कविता पुस्तक से अभिभूत हूँ |
जगदीश गुप्त— एक बात | युग्म मेरी मौलिक रचना है | उसकी विशेषता यह है कि वह ‘चित्रान्वित काव्य’ है |
प्रमोद सिनहा—जब ‘युग्म’ प्रकाशित हुआ तो उस समय बड़ी चर्चा थी | उसके चित्रों को लेकर, उसकी कविताओं को लेकर | कविता और चित्र एक ही मूड के, एक दूसरे के पूरक कहे जा सकत हैं | जो आपने कविताओं में नहीं कहा उसे आपने रेखाओं में कहा |
जगदीश गुप्त— जी | जो महादेवी नहीं कर सकीं.......जैसा उन्होंने किया वैसा मैंने नहीं किया.... किया उससे भिन्न | रेखाओं में बनाया.....रेखाओं में अनंत सम्भावना है | इसका सम्मान अज्ञेय जी ने किया और बांदिवेडेकर जी ने किया | अज्ञेय ने ‘युग्म’पर समीक्षा लिखी | ‘प्रतीक’ में छपी | ‘युग्म’को प्रगतिशील लोगों ने गाली दी कि प्रेम की कविता है तो मैंने कहा तुम्हारे भीतर प्रेम नहीं है, तुम प्रेम रहित हो ?
मैं विश्वास करता हूँ कि ‘युग्म’ का भविष्य है | इसी दृष्टि से मैंने भूमिका में उसे प्रतिष्ठित किया है | वह शिव और पार्वती का रूप है | जो शैव परम्परा से सम्बंधित है | कला श्लाध्याय शूलि ने | मैंने आपको बताया भी है | यहाँ इतना कह देता हूँ.... तबियत ठीक नहीं है |
[ डॉक्टर जगदीश गुप लगातार बोलने से थक गये थे और उन्हें असुविधा हो रही थी | इसलिए यह साक्षात्कार यहीं समाप्त कर दिया गया | ]
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