लेख

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1 तुलसी : सांस्कृतिक गरिमा के साहित्यकार हिन्दी साहित्य एवं भारतीय लोक जीवन में तुलसी प्रतिमानों के प्रतिमान होकर प्रतिष्ठित हैं। खरे-खोटे, भले-बुरे, सही गलत तथा ऊँच नीच का बोध जिस मानसिक धरातल से होता है, तुलसी उसके परिचायक न होकर शताब्दियों से उसके निर्माता रहे हैं। Download
2 तुलसी भजि राम कौ राम भये तुलसी भजि राम कौ राम भये Download
3 तुलसी का युग बोध और कलियुग की धारणा तुलसी साहित्य का आधार पौराणिक वैदिक विचारधारा पर आधारित है | वेद और उपनिषद साहित्य में कलियुग का विचार सामने नहीं आता, किन्तु पौराणिक साहित्य में अवश्य चतुर्युगी और चतुर्वर्णा व्यवस्था वैदिक विचारधारा का अंग बन गयी Download
4 तुलसी का कवि-व्यक्तित्व जिस कवि-व्यक्तित्व द्वारा ‘रामचरितमानस’ तथा ‘विनयपत्रिका’ जैसी असाधारण प्रौढ़ता-सम्पन्न काव्यकृतियाँ विनिर्मित हुई हों, उसकी महानता समय की अग्नि-परीक्षा के बाद, आज बहुत कुछ स्वयं सिद्ध है | Download
5 नैमिषारण्य संदर्भ...बोधकथा अहंकार का त्याग सबसे बड़ा त्याग है | पर यह सत्य बहुत कठिनाई से उपलब्ध हो पाता है | यह घटना नैमिषारण्य क्षेत्र के स्वामी नारदानन्द जी के आश्रम की पृष्ठभूमि का स्मरण कराती है जो मेरे माता जी के गुरु भी थे | Download
6 87. धर्मवीर भारती : कुछ आत्मीय सन्दर्भ धर्मवीर भारती ने परिमल पर ही नहीं, अज्ञेय पर भी व्यंग्योक्तियाँ और कटुक्तियाँ लिखित रूप में व्यक्त कीं जो मुझे अच्छी नहीं लगीं | फलतः हंस के एक अंक में धर्मवीर भारती के विषय मे मैंने एक विस्तृत लेख लिखा Download
7 नई कविता और आचार्य शुक्ल के रसानुभूति के विविध स्तर शुक्ल जी ने अपने विवेचन में आधुनिक साहित्य के पीछे एक प्रधान प्रेरक शक्ति के रूप में निहित हृदय की गहरी सच्चाई की उपेक्षा की है फलतः उनके सिद्धान्त मध्यकालीन साहित्य पर अधिक लागू होते हैं आधुनिक पर कम | Download
8 नई कविता और फैंटेसी की मानसिकता मैंने अपने लेख में इस ऐतिहासिक तथ्य को रेखांकित किया था कि नई कविता खड़ीबोली की नयी भंगिमा का स्वरूप सामने रखते हुए असाधारण साहित्यिकश्री का परिचय देती है। Download
9 नागवासुकि मन्दिर और प्रयाग में नाग पूजा की परम्परा सामान्यतया नाग और सर्प समानार्थी समझे जाते हैं परन्तु गीता ने स्पष्टतया दोनों में विभेद माना है| विभूतियोग नामक दसवें अध्याय में कहा गया है कि मैं सर्पों में वासुकि हूँ—सर्पाणामस्मि वासुकिः ||28|| Download
10 नन्दलाल वसु के कला-सम्बन्धी विचार नन्द बाबू ने साहित्य से शिल्प को अलग नहीं माना है। दोनों की प्रकृति एक जैसी मानकर उनका उद्देश्य भी मानव-मन को आलोकित करना बताया है। दुःख का कारण दूर करना दुःख दूर करने से बड़ी बात है ऐसा कहकर उन्होंने भारतीय संस्कृति और उसकी आध्यात्मिक विचारधारा का ही समर्थन किया है। Download
11 82. पंडित रामनरेश त्रिपाठी : एक राष्ट्रचेता व्यक्तित्व ‘मिलन’, ‘पथिक’, ‘मानसी’, ‘स्वप्न’, काव्य कृतियों तथा ‘जन्मभूमि भारत’ और ‘आह्वान’ आदि राष्ट्रीय कविताओं ने जिनके राष्ट्रचेता-व्यक्तित्व को इतना गरिमापूर्ण एवं स्मरणीय बना दिया कि साहित्य अकादमी जैसे सामान्य संस्था उनकी जन्मशती मनाने में अपना गौरव समझ रही है। Download
12 पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी पं0 श्रीनारायण चतुर्वेदी हिन्दी की उस पीढ़ी के साहित्यकार तथा विचारक हैं जिन्होंने खड़ी बोली हिन्दी को उसके शैशव काल में नाना रूपों में विभासित तथा पल्लवित होते देखा था | उस समय के उल्लेख योग्य रचनाकारों से तथा उनकी कृतियों से चतुर्वेदी जी का घनिष्ठ व्यक्तिगत परिचय था | Download
13 दूरदर्शी हिन्दी सेवी श्री श्रीनारायण चतुर्वेदी की दूरदर्शिता ने इस खतरे को भाँप लिया था और इसीलिए न्यायालय तक अपने विरोध को निरन्तर सक्रिय बना रखा। मैंने भी एक याचिका द्वारा अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी को प्रतिष्ठित करने की चेष्टा की, किन्तु अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण अभी तक सफलता नहीं मिला। Download
14 ‘प्रश्न’ शब्द तथा तुलसीदास और नन्ददास का सम्बन्ध सारी स्थिति को देखते हुए मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों के बीच किसी प्रकार का सम्बन्ध रहा अवश्य नहीं तो उसको सिद्ध करने वाले प्रमाण इतनी प्रचुरता से उपलब्ध नहीं होते और न इस प्रकार का प्रवाद ही इतना व्यापक रूप धारण का पाता| Download
15 प्रागैतिहासिक कला और बाल कला : एक सापेक्षिक परिदृश्य प्रागैतिहासिक कला से बाल कला का उतना साम्य नहीं है जितना आदिम कला और लोक कला से, किन्तु प्रागैतिहासिक कला अपनी प्रकृति में अधिकांशतः आदिम और अपने परिवेश में लोक कला के अत्यन्त समीप रही है अतः बाल कला से उसका तुलनात्मक अनुशीलन निराधार भी नहीं कहा जा सकता। Download
16 शबिस्ताँ-शबिस्ताँ चरगाँ-चरागाँ फ़िराक़ की ज़िन्दगी को कलमबन्द करना कितना मुश्किल काम था ये वही बता सकता है जिसने उनके साथ हर स्तर पर तरह-तरह से ज़िन्दगी जी हो और उसमें अपने को पूरी तरह घुला-मिला दिया हो | Download
17 ब्रजभाषा काव्य में नायक-नायिका-भेद यह सत्य है कि नायिकाभेद के बहुत से दोषों का मूल कारण उसके उस परम्परागत रूप निहित था जो ब्रजभाषा के कवियों को संस्कृत के आचार्यों द्वारा विरासत में प्राप्त हुआ था। Download
18 भारतीयता की धारणा : साहित्य-सौन्दर्य-संस्कृति पाश्चात्य चिन्तन केवल हमें प्रभावित ही नहीं कर रहा है वरन् स्वयं प्रभावित भी हो रहा है | प्राचीन मूल्यों की प्रासंगिकता अनेक दिशाओं में उजागर हो रही है | गीता की कर्म-प्रधान जीवन-दृष्टि आज के व्यावहारिक युग में विशेष उपयोगी मानी जाने लगी है | Download
19 महाकवि कालिदास किस युग के थे ? कवि के रूप में कालिदास की अद्वितीयता जितनी निर्विवाद है, उनका काल-निर्धारण उतना ही विवादास्पद, शुंगकालीन अग्निमित्र से लेकर मध्यकालीन राजा भोज तक उनकी या कालिदास-नामधारी अन्य कवियों की सम्भावना मानी गयी है।

मैं तो मानता हूँ कि कालिदास के काल-निर्णय में यह मृत्पदक अन्य दोनों शिल्पनों से विशिष्ट तथा अधिक महत्वपूर्ण है। सत्य को निकट ले आने में वह निश्चय ही सहायक होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
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20 महादेवी की कला-दृष्टि चित्रों में काव्य-दिशाएँ कुछ नए संकेत देती हैं | ‘दीपशिखा’ के चित्र सचेष्ट भवांकन में एक रंगी हैं | नीले-सफेद से उनका काम चल जाता है | प्रायः उनके भाव-चित्र जल रंगों से निर्मित हुए हैं | Download
21 महादेवी के व्यक्तित्व में : कविता और चित्रकला का सहभाव महादेवी की रचनाशीलता में कविता और चित्र के संस्कार प्रारम्भ से ही दृष्टिगत होते हैं | ऐसे संस्कार, उन्हीं में नहीं और भी अनेक ऐसे कलाकार हुए हैं जिनमें चित्रमयी कल्पना काव्यरूप में और काव्यमयी कल्पना चित्र के रूप में सहज ही बिना प्रयास प्रकट होती रही है | Download
22 मानस की महत्ता और तुलसीदास के दार्शनिक विचार यद्यपि तुलसी विषयक बहुत सा साहित्य प्रकाशित हो चुका है तथापि मेरे विचार से उसमें पिष्ट-पेषण ही अधिक है, नये आधारों पर तुलसी के कवित्व की महानता का सम्यक् आकलन अभी शेष है। ऐसे नये आधारों में तुलनात्मक अध्ययन प्रमुख है। Download
23 मार्क्सवाद और प्रगतिशील आलोचना-दृष्टि वामपंथी मोर्चा अन्य राजनैतिक पार्टियों की तरह असहिष्णुता का शिकार होकर साहित्य में भी टूटता-बिखरता दिखाई देता है | प्रगतिशील आलोचना की वर्तमान परिणति इसका ज्वलन्त प्रमाण है | Download
24 मीराँ के कुछ अप्रकाशित पद आठ पद अनेक दृष्टियों से उपयोगी और महत्वपूर्ण हैं | इनसे मीरां सम्बंधी अध्ययन पर कुछ अधिक प्रकाश पड़ सकेगा ऐसी मैं अशा करता हूँ | Download
25 मेरा रचना-कर्म कविता को मैं मनुष्यता की मातृभाषा मानता हूँ | काव्य-भाषा ही समस्त साहित्यों की आदिभाषा रही है | सृष्टि कर्मा विधाता ने वाणी को अपनी सृष्टि में सर्वोपरि माना और वह मिथकीय रूप में उसकी आत्मजा और अर्धांगिनी दोनों सिद्ध हुई | Download
26 मेरी काव्य-यात्रा कविता मेरे लिए उसी रचनाशीलता का एक विशिष्ट अंग है जिसकी भूमिका कलाजगत के साथ भावजगत और व्यवहारजगत तक व्याप्त दिखाई देती है | कला और कविता को मैं जिस रचनाधर्मिता का प्रतीक मानता हूँ वह जीवन-दृष्टि का अभिन्न अंग है | Download
27 मैत्री और मानवता के प्रतिमान : शर्मा जी मितभाषी, सदाशयी, गुणदर्शी तथा सहज स्नेही शर्मा जी उन गिने-चुने लोगों में से थे जो अपने आचरण से दूसरों को प्रेरणा देते थे क्योंकि उनके कर्म, उनके मन और वचन के साथ पूरी संगत रखते थे। Download
28 मेरी दृष्टि में नई कविता भावना को नया स्तर प्रदान करते हुए नई कविता का लक्ष्य आधुनिक चेतना एवं संवेदना से सम्पन्न व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा करना है। मैं इसे नए मनुष्य की प्रतिष्ठा कहूँगा। Download
29 मेरे सखा : उर्मिल प्रसाद शुक्ल मेरे एक साथी थे—ऋषि कुमार सक्सेना जो म्योर हॉस्टल में मेरे साथ रहते थे | वे आध्यात्मिक और दार्शनिक मनोवृत्ति के थे और मेरी उनकी गहरी आत्मीयता थी | उर्मिल प्रसाद जी से भी वे आत्मीय भाव रखते थे | Download
30 रक्त वर्णा सरस्वती निराला ने अवश्य “तुलसीदास में शारदा नील-वसना” का वर्णन किया है | कवियों ने शुक्लवर्णा सरस्वती की प्रशस्ति कभी समाप्त नहीं की | “या कुन्देन्दु तुषार हार धवला या श्वेतपद्मासना” आदि कहते ही रहे | तांत्रिक साहित्य में अवश्य “नीलवर्णा” तथा ‘रक्तवर्णा’ सरस्वती की कल्पना की गयी है | Download
31 रवीन्द्रनाथ : कला-चिन्तक के रूप में कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का व्यक्तित्व अपनी 'गुरुदेव' संज्ञा की वास्तविक सार्थकता कदाचित एक सजग युगद्रष्टा और तत्वदर्शी कला-चिन्तक के रूप में ही उपलब्ध करता है | उनकी कला-दृष्टि तल-स्पर्शी, गम्भीर और विवेक-युक्त रही है | Download
32 राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी कवि रूप में ‘मेरी इक्यावन कविताएँ’ नाम से जो संग्रह मेरा ध्यान केन्द्रित किये हुए है वह मुझे अप्रत्याशित सुख दे रहा है क्योंकि इससे पूर्व श्री अटल बिहारी वाजपेयी को कवि-रूप में मैं प्रायः नहीं जानता था । Download
33 राम की ‘शक्तिपूजा’ का प्रेरणा-स्रोत : शिवमहिम्न स्त्रोत जहाँ तक शिवमहिम्न स्त्रोत का प्रश्न है अवश्य यह स्त्रोत निराला जी को वाणी सिद्ध रहा होगा | उनका संस्कृति-ज्ञान कितना गहन था कि वे संस्कृति में भाषण देने के लिए भी तत्पर हो जाते थे | Download
34 रामचरितमानस और रूसी जन-चेतना भारतवर्ष और रूस की मैत्री आकस्मिक नहीं कही जा सकती | भारतीय मानस जैसे लोकधर्मी है वैसे ही रूस भी जनचेतना को सर्वोपरि महत्व देता है | बरान्निकोव जी की भी आत्मा में तुलसी और राम इस प्रकार बस गये थे कि उनके आत्मज को भी वही संस्कार प्राप्त हो गए | Download
35 वर्तमान काव्य की प्रवृत्तियाँ शैली और शिल्प के क्षेत्र में जो क्रान्तिकारी परिवर्तन हिन्दी कविता में दिखाई देता है उसे केवल विदेशी नकल कहकर टाला नहीं जा सकता | उसको धारण करनेवाली नई चेतना इसी देश की संघर्षपूर्ण स्थिति से अनुप्राणित है | Download
36 लोक-कला के प्रतीक और भारतीय प्रागैतिहासिक चित्रकला भारतीय संस्कृति के स्रोत अत्यन्त गहन हैं | उन्हें केवल वैदिक वांग्मय, सिन्धुघाटी की पुरातात्विक सामग्री तथा लोक-गाथाओं एवं लोक-कलाओं तक सीमित नहीं माना जा सकता क्योंकि अब प्रागैतिहासिक चित्रों की विशाल उपलब्धि के बाद यह नवीन स्रोत संस्कृति के स्वरूप-निर्धारण में विशेष महत्व रखने लगा है | Download
37 रीतिकाव्य में हीन रुचि का प्रदर्शन रीतिकाव्य में ऐसे अनेक कवि हैं जिन्होंने हीन ही नहीं गर्हित और अश्लील रुचि का भी खुला प्रदर्शन किया है | ऐसी स्थिति रीतिकाल के पूर्वार्ध में कम और उत्तरार्ध में अधिक लक्षित होती है | Download
38 रीति काव्य की भाषा जिस मध्यदेश में मुख्यातया रीति काव्य रचा गया वह सदा से ही विविध भाषाओं के संगम का केन्द्र रहा है | Download
39 रीति कवि का व्यक्तित्व मेरी दृष्टि में सामान्य रूप से रीतिकवि का व्यक्तित्व चारण, सभाकवि, राजगुरु, आचार्य और भक्त का न्यूनाधिक समन्वय है | Download
40 राय कृष्णदास : कवि और कलाविद् द्विवेदी युग और छायावाद युग की सन्धि के साक्षी राय कृष्णदास का साहित्यिक व्यक्तित्व कवि रूप में उतना विख्यात नहीं है जितना कला-मनीषी के रूप में | विद्या-व्यसनी और कला-मर्मज्ञ होने के साथ वे भारतेन्दु की परम्परा से पारवारिक रूप से सम्बद्ध थे | Download
41 श्रीराम कथा चित्रवीथिका की अद्वितीयता श्रीराम कथा—चित्र वीथिका एक असाधारण प्रकाशन है जिसके सम्पादक डॉ. कृष्णदत्त बाजपेयी अब दिवंगत हो गये हैं | इस पुस्तक के सन्दर्भ में उनका कथन है “भारत तथा विदेशों में प्राप्त रामकथा के प्राचीन मूर्त दृश्यों का चित्रधारा” इस चित्रवीथिका में राम-कथा के अद्वितीय दृश्य समाहित हैं | Download
42 वैष्णवता और मानववादी-दृष्टि वैष्णवता का उदय मानव-विकास की उस अवस्था का द्योतक है जब मनुष्य ने हिंसा के सुदीर्घ अनुभवों को सरणि पार करने के बाद अहिंसा को परम धर्म स्वीकार किया। मूल्यात्मक दृष्टि का यह परिवर्तन वैदिक और अवैदिक दोनों विचार-धाराओं में लक्षित होता है। Download
43 विष्णुधर्मोत्तर पुराण का कला- चिन्तन विष्णुधर्मोत्तर का तृतीय भाग भारतीय चित्रकला की विविध शाखाओं, विधियों और आदर्शों पर विशद रूप से प्रकाश डालता है | इसमें धार्मिकता का समावेश होने के साथ ही साथ लौकिकता का भी समावेश है | Download
44 विदेशों में प्रागैतिहासिक चित्रों की खोज ऐलन हाटन ब्रॉड्रिक ने कदाचित पहली बार विश्वव्यापी स्तर पर प्रागैतिहासिक चित्रकला का सम्यक् परिचय अपनी संक्षिप्त किन्तु विशिष्ट पुस्तक ‘प्रिहिस्टॉरिक पेटिंग’ (Prehistoric Painting) में प्रस्तुत किया है | Download
45 विदुर-नीति और गीता : तुलनात्मक दृष्टि से विचारणीय सन्दर्भ गीता और विदुर-नीति के वाक्यांश ‘रामचरितमानस’ में अनेक स्थानों पर सन्दर्भित दिखायी देते है। भारतीय लोकचेतना नीति-काव्य को विशेष महत्व देती रही है। Download
46 वाद-मुक्त काव्य- दृष्टि के उद्घोषक आचार्य शुक्ल आचार्य शुक्ल भारतीय चिन्ताधारा के सही अर्थ में मौलिक एवं प्रामाणिक समीक्षक हैं। विशद अध्ययनशीलता तथा पूर्व-संस्कारों से अर्जित उनकी काव्य-दृष्टि तत्वतः विश्व-दृष्टि का पर्याय प्रतीत होती है। Download
47 54. वाद-मुक्त धरातल की खोज बनाम डॉ. देवराज की काव्य-दिशा नयी कविता के संघर्ष-काल में जिनके चिन्तन-मनन से मुझे शक्ति मिली उन समीक्षक साहित्यकारों मंं डॉ. देवराज का नाम कई कारणों से अविस्मरणीय है | Download
48 संस्कृति की अवधारणा का भारतीय मूल सामान्यतः यही माना जाता है कि कि संस्कृति शब्द ‘Culture’ का अनुवाद है और अंग्रेजी साहित्य से परिचित होने से पहले यह शब्द संस्कृत भाषा में भी अप्राप्य था | Download
49 संस्कृति में कला और कविता की प्रभाव-प्रक्रिया मैं यह बराबर अनुभव करता हूँ कि जो परिवर्तन घटित होते हैं, जो प्रभाव किसी भी संस्कृति पर पड़ते हैं यदि उनकी अभिव्यक्ति अत्यन्त सूक्ष्म, सांकेतिक और स्पष्ट रूप से दिखायी देती है, तो वह कविता में दिखाई देती है | Download
50 सहज साधना सन्दर्भ शब्दों के भी नसीब का जोर होता है | “सहज” शब्द भी खींचतान में आया है | ‘ह’ और ‘ज’ ये दोनों अक्षर हठयोग और जपयोग के लिए प्रतीक रूप में व्यवहृत बताए गए हैं और जो साधना ‘ह’ और ‘ज’ को साथ साथ लेकर चले, उसे ‘सहज-सधना’ कहा गया है | Download
51 साध्य- साधना- विवेक और मानवीय सभ्यता का संकट मनुष्य एक सन्तुलन में सार्थकता अर्जित करता है | यह सन्तुलन सांस्कृतिक आयाम से वेष्ठित रह कर उसके उत्कर्ष में सहायक होता है | Download
52 साम्यवाद : परिणति और नियति अनेक अन्तर्विरोधों के बाद भी विश्वव्यापी स्तर पर मार्क्सवादी विचारधारा बीसवीं शताब्दी की सबसे प्रखर और प्रभावशाली विचारधारा रही है | यह दूसरी बात है कि उसकी इतनी नाटकीय परिणति सर्वथा अप्रत्याशित थी | Download
53 फ़ादर बुल्के : मेरे गुरु भाई जो इलाहाबाद को अपना ‘मैका’ कहे और बार-बार वहाँ जाने को तरसता रहे, ऐसा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है फ़ादर बुल्के के सिवा | नारी-भावना से एकान्वित उनका यह पुरुष-भाव उन्हें एक प्रकार से अर्धनारीश्वर के निकट ला देता है | Download
54 मध्यकालीन मूल्यदृष्टि और तुलसीदास तुलसीदास मात्र युग-द्रष्टा ही नहीं, आत्मद्रष्टा कवि भी थे | परिणामतः उनके साहित्य में जो मूल्यबोध मिलता है वह स्थायी और अस्थायी दोनों प्रकृतियों का है और असहमति, विरोध तथा खंडन की प्रवृत्ति का भी उसमें अभाव नहीं है | Download
55 तुमको पीड़ा में ढूँढा, तुममें ढूँढूँगी पीड़ा उनकी कविताओं में यह प्रतीकात्मक ‘तुम’ सदा रहस्यात्मक ही बना रहा पर मैं कभी नहीं मान पाया कि महादेवी जी का जीवन-संघर्ष मीरा जैसी आध्यात्मिक-भूमिका रखता था | Download
56 साहित्य और संस्कार साहित्य व्यक्ति और समाज की समन्वित चेतना से उत्पन्न होता है और रचनात्मकता उसका मूल आधार है। ऐसी विचारधारा जो व्यक्ति का निषेध करके समाज को सर्वोपरि मानती है एकांगी कही जाएगी। Download
57 साहित्य-पुरुष द्विवेदी जी छठे दशक में नई कविता आन्दोलन की आवेगपूर्ण गतिविधि को सूक्ष्म दृष्टि और सहज आलोचनात्मक-वृत्ति से देखते हुए वे कभी आशंसा और कभी स्मित-व्यंग्य-विनोद से मुझे प्रेरित करते रहे| Download
58 सृजनशीलता और सौन्दर्यबोध सृजनशीलता मानव-संस्कृति का आधारभूत तत्व है | मनुष्य अपने में जिस व्यापक चेतना का अनेक-स्तरीय अनुभव करता है, वह मूलतः सृजनधर्मी है | Download
59 स्थिति, गति और प्रगति सब जानते हैं “क्रियान्तर विश्रान्तिः लयः”। इस सूत्र वाक्य में ‘क्रिया’ और ‘विश्रान्ति’ दोनों शब्द लय के तात्विक स्वरूप को निर्धारित करते हैं पर जीवन और मन सक्रिय क्यों होता है, और विश्रान्ति की ओर क्यों प्रभावित होता है? इसका उत्तर पाना आसान नहीं है। Download
60 हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं की समस्याएं हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं की कहानी काफी लम्बी और रोचक है | उनकी समस्याएं भी उतनी ही जटिल और अनेकमुखी हैं | Download
61 हिमालय के अप्रतिम शिल्पी मेरे विचार से रोरिक की कला रूस की नहीं सारे संसार की भाव-सम्पत्ति है जिस पर मनुष्य मात्र का जन्म सिद्ध अधिकार है | यह बात वस्तुतः सभी श्रेष्ठ कालजयी कलाकृतियों पर लागू होती है Download
62 रवीन्द्रनाथ की चित्रकला एक महान साहित्यकार होने के अतिरिक्त वे सक्रिय चित्रकार भी थे—यह तथ्य अधिक लोगों को ज्ञात नहीं है।
कवि न केवल शब्दों से अपने को व्यक्त करता रहा, वरन् उसने रंग और रेखाओं का नवीन माध्यम भी अपनाया जो बहुतों को आकस्मिक और आश्चर्यजनक लगा।
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63 रामराज्य आदर्शों का आदर्श है राम और रामराज्य की कल्पना स्वर्ग की कल्पना के समान सुखद, काम्य और यथार्थ से निरन्तर दूर रहनेवाले आदर्श राज्य ‘यूटोपिया’ का भारतीय स्वरूप है | Download
64 युग, साहित्य, राजनीति और राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी पं. माखनलाल चतुर्वेदी जिस युग में पैदा हुए थे उसकी प्रतीति हम तभी कर सकते हैं जब आत्मोत्सर्ग और देश के लिए बलिदान को सर्वोपरि मानव-मूल्य के रूप में स्वीकार करें | Download
65 सीता की अग्नि-परीक्षा : रामकथा का एक प्रसंग आपने मेरे ‘शील’ की ही नहीं मेरी ‘भक्ति’ की भी उपेक्षा की है | लक्ष्मण चिता तैयार करें, मैं मिथ्यापवाद दोष से कलंकित होकर जीवित रहना नहीं चाहती |” Download
66 गुजराती कृष्ण-काव्य में राधा की एक नवीन सखी—राही जहाँ तक राधा की प्रसिद्ध सखियों का प्रश्न है—गुजराती के अतिरिक्त हिन्दी, बंगला आदि अन्य प्रान्तीय भाषाओं के कृष्ण साहित्य में भी इनका प्रचुर वर्णन मिलता है | परन्तु राही का नामोल्लेख भी कहीं नहीं मिलता | इस प्रकार राधा की सखी-रूप में राही का वर्णन मात्र गुजराती कृष्ण-साहित्य की विशेषता है | Download
67 भाई वीर सिंह : पंजाबी के महान कवि ‘महान साहित्यकार भाई वीर सिंह’ की जैसी प्रशस्ति हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने की उसमें उनकी रवीन्द्र-भावना की छाया उतर आई है | Download
68 पाने और खोने की कल्पना स्वतन्त्रता के पहले कर्तव्य की भावना प्रधान थी और उसके बाद अधिकार की चेतना सर्वोपरि हो गई | यहाँ तक कि राष्ट्रप्रेम जैसा शब्द भी निरर्थक लगने लगा | Download
69 परम्परा का सवाल और काव्य की भाषा परम्परा जब अस्मिता की अन्वेषणात्मक धारणा से उपजती है तो वह स्वत्व की पहचान बन जाती है | उसे नकारना खुद अपने को नकारने जैसा हो जाता है | परन्तु सार्थकता और मूल्यवत्ता के बिना उसे ढोते रहना भी बेमानी लगने लगता है | Download
70 निराला के स्वगत निराला जो कुछ वे अपने से कहते रहते थे, वह सर्वथा निरर्थक या पागल का प्रलाप मात्र हो यह कहना मेरे लिए सम्भव नहीं है, क्योंकि मैंने कई बार उनके स्वगतों में गहरी किन्तु अस्फुट अर्थपूर्णता का अनुभव किया | Download
71 नई कविता में रस और बौद्धिकता नई कविता ने युग की नई चेतना से उत्पन्न हुई है और उसकी अभिव्यंजना-प्रणाली वही नहीं है जैसी सामान्यतया काव्यशास्त्रियों द्वारा जानी समझी गई है। शास्त्र और उसके सिद्धान्त साहिय के किन्हीं रूपों के आधार पर निर्मित होते हैं। नए रूपों के विकास के साथ प्रायः नए शास्त्र और नए सिद्धान्तों की आवश्यकता ही है। Download
72 पन्त जी के जन्मदिवस पर ‘परिमल’ ने इलाहाबाद के साहित्यिक वातावरण को जो दीप्ति प्रदान की उसमें सबसे महत्वपूर्ण नाम सुमित्रानन्दन पन्त का है जिन्होंने आजीवन कौमार्य-व्रत धारण करते हुए सब कुछ वाणी के मन्दिर को अर्पित कर दिया | Download
73 इलाहाबाद और धर्मवीर भारती भारती से मेरा पहला परिचय हरिद्वार में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में ‘गोपेश’ के माध्यम से हुआ | उसी अवसर पर हिन्दी के प्रमुख कवि सोहनलाल द्विवेदी, वंशीधर शुक्ल और नेपाली आदि बुलाए गए थे | कविता का मंच गीत-प्रधान था, फिर भी गीत-तत्व वाली कविताएँ भी पढ़ी गईं | Download
74 गुजराती और ब्रजभाषा काव्य में वात्सल्यमय उदगारों का चित्रण ब्रजभाषा के कवियों की तरह नंद-यशोदा के हृदय की अभिव्यक्ति तक ही अपने को सीमित रखकर गुजराती कवियों ने वसुदेव और देवकी के मनोभावों की उपेक्षा नहीं की है। Download
75 गाँधी और गाँधीवाद की कला-दृष्टि श्रेष्ठ कला की पहचान गाँधी जी को उनके जीवन-दर्शन ने ही दी जिसमें कला स्वयं महत्व नहीं रखती। कला के स्तरों का बोध भी उनके मन में था पर जीवन का परिष्कार करने का संकल्प रखने वाला मनस्वी किसी छोटी चीज से सन्तुष्ट नहीं हो सकता। Download
76 गाँधी जी का हरिजन-भाव : एक नई उद्भावना ‘हरिजन’ शब्द वैष्णव जन का पर्यायवाची है | नरसी मेहता ने अपने प्रसिद्ध पद “वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाणे रे।” में समस्त मानवीय एवं आध्यात्मिक गुणों को वैष्णव के भीतर केन्द्रित कर दिया है। गाँधी जी ने इसी कारण नरसी का यह पद अपनी प्रार्थना का अंग बना लिया था। Download
77 गाँधी जी और कला अपने समस्त अनुभवों के उपरान्त मैं यह बात कह सकता हूँ कि जीवन की पवित्रता सबसे बड़ी और सच्ची कला है। जिसकी पृष्ठभूमि पवित्र नहीं है वह वास्तविक कला नहीं है। — राष्ट्रपिता Download
78 गरीबी हटाओ-अंग्रेजी लाओ नेहरू-नीति ने अपनी लोकप्रियता के बल पर अंग्रेजी को ऐसा सर-चढ़ा बना दिया कि सब भूल गये कि अंग्रेजी इस देश की भाषा ही नहीं है | सबको लगने लगा कि यदि छूट गयी तो प्राण छूट जायेंगे | Download
79 खड़ी बोली के काव्य पुरुष हिन्दी के वर्चस्व का यह विशिष्ट और असामान्य कारण जितनी महत्ता रखता है उतनी उसे अभी तक प्राप्त नहीं हुई, अन्यथा मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवि को नए समीक्षकों द्वारा निष्प्रेरक और अप्रासंगिक न मान लिया गया होता | Download
80 कृष्णाय तुभ्यं नमः जयदेव के ‘गीत गोविंद’ में दशावतार स्तुति वैष्णवों में सर्वमान्य हो गई किन्तु एक अन्तर कालान्तर में घटित हुआ और वह यह कि बलराम के स्थान पर कृष्ण को अवतार मान लिया गया | मूलतः कृष्ण अवतारी हैं अवतार नहीं | Download
81 कविता का छायावाद बनाम / आलोचना का छायावाद छायावाद से उनकी अभिन्नता सुविज्ञात है | उन्होंने छायावाद का प्रथम प्रयोग नहीं किया वरन छायावाद-रहस्यवाद को एकात्म मानकर जो स्थापनाएँ प्रारम्भिक काल में की उनकी उपेक्षा के कारण बहुत सी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गईं | Download
82 कला का मूल उत्स : मानवीय सहानुभूति कला मानव में अंतर्निहित रचना-शक्ति एवं सौंदर्यबोध का समांवित प्रतिफलन है | उसका लोक-रूप मानव मात्र की चित्त-वृत्तियों से निर्धारित होता है परन्तु विशिष्ट रूप की रचना, उद्भावना, परिष्करण तथा प्रथम प्रस्तुतिकरण कलाकार के द्वारा ही सम्पन्न होता है | Download
83 एकता का दर्शन और प्रदर्शन एकता आत्मीयता का प्रतीक है | वह उसका पर्याय भी है | आत्मीय भाव सबको प्रिय लगता है | उसका शत्रु है वैरभाव, वैर अज्ञान से उत्पन्न होता है | स्वार्थ को परमार्थ से ऊपर मानने से होता है और अहंकार की विकृति से भी वैर के अंकुर उपजते हैं | Download
84 एक काव्यात्मक सीमा- विवाद श्री क्षेत्रपाल के हरिहरोपासना विषयक शोध-कार्य के निर्देशन-क्रम में ऐसे दो मध्यकालीन श्लोक मेरे सामने आए, जिन्हें मैं कभी भुला नहीं सका | पहले श्लोक की तो समाप्ति ही ‘सीमा-विवाद’ शब्द से होती है | उसके अन्तर्गत पुरुष-पक्ष की एकात्मता और नारी-पक्ष का द्वन्द्व दिखाकर जो सूक्ष्म व्यंग्य कवि ने किया है, वह सीमा-विवाद के पौराणिक प्रसंग की रोचकता को और परिवर्धित कर देता है | Download
85 उर्दू का सवाल हिन्दी-उर्दू की एकता केवल हिन्दी प्रदेश तक सीमित नहीं रही| ‘दक्खिनीहिन्दी’ का भी उसमें पर्याप्त योगदान रहा है| आज उर्दू हिन्दुस्तान के साथ-साथ पाकिस्तान और कश्मीर का प्रतीक भी बन गई है| हिन्दी उर्दू की अभिन्नता मानकर इस तथ्य को व्यापक एकता का आधार बनाया जा सकता है | Download
86 आस्था की नदी गंगा गंगा भारतीय संस्कृति का महाप्रवाह है, जो लोक और वेद दोनों तटों के बीच प्रवाहित होता रहा है | लोक-चेतना में गंगा पवित्रता, निर्मलता, नरैंतर्य और मृत्युंजयी अमृत का प्रतीक है | Download
87 आधुनिक साहित्य : कविता कविता मूलतः स्मृति-लक्षणा होती है और इसी रूप में वह युगों पहले सामने आई | वह स्मृति से उपजती है, स्मृति में बनी रहती है और अन्ततः कवि को स्मरणीय बना देती है Download
88 आज का गुजराती साहित्य भारतवर्ष की सभी प्रमुख प्रान्तीय भाषाओं के साहित्य में अर्वाचीन युग का आरम्भ 19वीं शती के उत्तरार्ध से होता है | हिन्दी, बंगाली, मराठी आदि की तरह गुजराती की भी यही स्थिति है | इस शती के मध्य में दो मुख्य बातें हुईं जिनका देशव्यापी प्रभाव पड़ा और वह उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया | Download
89 अनेकमुखी प्रतिमाओं की परम्परा और पंचमुखी हनुमान पंचमुखी हनुमान भी इसी विचारधारा की सृष्टि हैं ऐसा कहा जा सकता है। शिव और विष्णु का यह विचित्र सम्मिलित रूप है जिसमें वैष्णव तत्व प्रधान दिखायी देता है। स्वयं हनुमान एक ओर महाविष्णु राम के दूत हैं, दूसरी ओर एकादश रुद्र के प्रतीक भी हैं। Download
90 आजु ब्रज मैं हरि होरी Download
91 छन्द और रचनाशीलता का निजी अनुभव मेरे निकट 'लय की नदी' में 'गति' और 'यति' की स्थिति बन्धनों से स्वयं मुक्त हो जाती है | Download
92 चित्रकार, कवि मोलाराम की चित्रकला और कविता मोलाराम राज-परिवार के साथ श्रीनगर छोड़कर अलकनन्दा के उस पार टेहरी-गढ़वाल नहीं गए। श्रीनगर में हस्तिदल चैतरिया को मोलाराम सन् 1903 में मिले। किन्तु मालूम होता है कि मोलाराम की चित्रकला की ख्याति नेपाल की राजधानी काँतिपुर तक पहुँच चुकी थी। Download
93 चित्रकार जगदीश गुप्त चित्रकार के रूप में उन्होंने कलाकृतियों का गहरा निरीक्षण किया है | उनके सभी चित्र तो मैंने देखे नहीं किन्तु जो देखे हैं उन्हीं के आधार पर कह रहा हूँ | चित्रकार बनने के लिए अपने आतराफ देखने की क्षमता उनमें है | Download
94 समय की स्मृति : जगदीश गुप्त पुस्तक: समय की स्मृति : लेखक : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी Download
95 कैलाश गौतम : कवि कथन मनुष्यता को बचाये और जिलाए रखने का जितना काम आज तक अकेले अविता ने किया है उतना सैकड़ों राजनीतिक पार्टियाँ शताब्दियों तक नहीं कर सकती | वे बहुधा मनुष्य को नगण्य या क्षुद्र बना देती हैं जो मुझे कदापि सह्य नहीं है | Download
96 शब्द और अर्थ पृथक सत्ता रखते हैं इसी प्रकार लिपि में तथा अन्य संकेत विधियों में 'अर्थ' शब्द-निरपेक्ष होकर अवतरित होता है। शब्द श्रवणीय है; अर्थ बुद्धि ग्राह्य। वाणी और साहित्य में ही आकर शब्द और अर्थ दोनों अन्योन्याश्रित, असंपृक्त तथा अभिन्न अवस्था प्राप्त करते हैं। शब्दार्थ के एक-प्राण हो जाने में ही साहित्य की सार्थकता है। Download
97 3 अगस्त, 1988 सचिव वक्तव्य भारतीय मनीषा कवि को सर्वोपरि स्थान देती रहती है। यूरोपीय देशों की तरह यहाँ कवि को असामाजिक और अवांछित प्राणी कभी नहीं माना गया। आगे चलकर यहाँ भी कवि मानव-अधिकार के निर्धारक तथा जन्मजात प्रतिपक्षी माने जाने लगे। Download
98 जब मैं प्रयाग विश्वविद्यालय में अध्ययन करने आया 1944 में 10 दिसम्बर को “परिमल” नामक संस्था की स्थापना हुई जिसकी प्रेरणा निराला जी के काव्य “परिमल” से प्रेरित थी | इसकी प्रतिक्रिया में कुछ समय बाद पन्त जी की रचना 'गुंजन' पर अधारित दूसरी संस्था “गुंजन” अस्तित्व में आई और छायावाद के दो महाकवियों की प्रेरणा से यहाँ का वातावरण गुंजरित होने लगा | Download
99 “जीवन्त बवंडर” निराला और उन्हें राखी से बाँधती महादेवी महादेवी और निराला का स्नेह-सूत्र पूरे परिवेश को बाँधे हुए था | निराला भाई, उसी से उपजा | महादेवी के मन में कच्चे सूत की पावनता दृढ़ से दृढ़तर होती गई | निराला की कलाई उसी अत्मीयता का प्रतीक थी | Download
100 जो प्रयाग में सम्भव है, वह दिल्ली में नहीं हर देश की कला किसी-न-किसी वाद का आश्रय लेकर ही सार्थक सृजन करे, यह आवश्यक नहीं है | अपनी संस्कृति और अपनी जनता से जुड़कर किसी ऐतिहासिक आवश्यकता या उपलब्धि की प्रेरणा भी उसे नए शिल्प की दिशा में गतिशील कर सकती है | Download
101 अर्धशती की कविता यात्रा और जगदीश गुप्त जगदीश गुप्त नई कविता आन्दोलन से उसके आरम्भ से ही सक्रियता से जुड़े रहे | आपने सन 54 से 67 तक अनियतकालीन 'नई कविता' नामक बहुचर्चित कविता अंको का सम्पादन किया जिससे शुरुआत से ही इस आन्दोलन को एक नई दिशा मिली, मंच मिला, और उसका स्वरूप और काव्यशास्त्र का विकास-विस्तार हुआ, साथ ही कविता आन्दोलन ने अपनी पहचान भी बनाई | Download
102 नवल किशोर 55 राजस्थान साहित्यकार प्रस्तुति नवल किशोर Download
103 काव्य-सृजन और कवि का 'ब्रह्म' 'ब्रह्म' को मैथिलीशरण गुप्त ने कई बार पहचाना और अन्ततः उसके निर्णय को अपने सजग मन की चेष्टाओं से ऊपर प्रतिष्ठित किया। Download
104 रेखाओं के कुशल शिल्पी : डॉ.जगदीश गुप्त 'नाव के पाँव' के अतिरिक्त 'शब्द दंश' 'हिमविद्ध' आदि संकलनों के अतिरिक्त नईकविता के एक से लेकर आठ अंक तक का सम्पादन मैंने किया है , परिमल के संयोजक के रूप में भी मैं कार्य कर चुका हूँ Download
105 गुजरात और मध्यदेश का सांस्कृतिक सम्बन्ध कृष्ण का यादवों समेत मथुरा को छोड़कर द्वारका में जा बसना एक ऐसी घटना है जिसे दोनों प्रदेशों के सांस्कृतिक सम्बन्ध के प्रतीक रूप में ग्रहण किया जा सकता है। कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा है और देहोत्सर्ग-भूमि गुजरात। Download
106 कुछ निजी विचार-सूत्र उसका अभाव देश-काल और भाषा के विभेदों का अतिक्रमण करने में अपनी सार्थकता व्यक्त करता है | इस नाते भाषा-बद्ध साहित्य की तुलना में कला की व्यापकता और प्रभविष्णुता का विशेष एवं स्वतन्त्र महत्व है | Download
107 कविता सूक्तियाँ कविता सूक्तियाँ Download
108 कृष्णलीला के चित्रण में सान्तता और अनन्तता की समस्या अद्वितीयता, अनेकता, गतिशीलता, प्रतिबिम्बमयता, सूक्ष्मता, रूप-भेद, भाव-भेद, रस-भेद तथा शैली-भेद को कृष्ण-लीला-चित्रण में किस प्रकार असाध्य से साध्य बनाया गया है, यह कलाविदों के सत्संग और जीवन्त सम्पर्क से ही जाना जा सकता है | Download
109 कृष्ण की बाल-लीला गीता और भागवत से लेकर अब तक कृष्ण को परब्रह्म मानने और उनकी लीलाओं को विराट सृष्टि विस्तार-प्रक्रिया के अर्थ में ग्रहण करने की यह परम्परा आज तक अक्षुण्ण है | Download
110 गुजराती कवि भालण का कृष्ण जन्म वर्णन मध्यकालीन गुजराती साहित्य में अनेक कृष्णभक्त कवि हुए हैं, जिन्होंने सूर, नन्ददास आदि की तरह ही कभी पदों में, कभी आख्यानों में, कृष्णाचरित गान किया है | ऐसे कवियों में अग्रगण्य हैं नरसी मेहता, भालण, प्रेमानन्द तथा दयाराम | Download
111 चित्रकला और कविता का साहचर्य 'रेखा सशंत्याचार्याः' भारतीय कला-दृष्टि का मूल मन्त्र रहा है | वह मूल्यवत्ता का निर्धारक है | मैं मानता हूँ कि 'चित्रकला सब कलाओं की आँख है' जो काव्य को (भी) समृद्ध करती है | शब्द की तुलना में रेखाएँ अधिक समृद्ध सिद्ध हुई हैं | Download
112 टेराकोटा का अद्भुत संग्रह और डा0 गुप्त का तहखाना Download
113 कवि, चित्रकार व 'नई कविता' के प्रवर्तक डॉ0 जगदीश गुप्त युवा पीढ़ी में डॉ. जगदीश गुप्त और डॉ. धर्मवीर भारती थे | और भी कई थे | और लोगों से घनिष्टता नहीं हो सकी | मेरा मन हमेशा कहा करता है कि ऐसी गोष्ठी हमारे विश्वविद्यालयों में बारम्बार हो तो हमारा स्तर कितना ऊँचा हो जाय | Download